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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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   दोहे

 

कुछ दोहे

एक तरफ हैं चाँद पर, इंसानों के पाँव

और इधर अंधेर में, सदियों से हैं गाँव  

 

ना पानी ना सड़क की, कोई करता बात,

हर नेता है पूछता, किसकी क्या है जात  

 

बाप दरोगा हो गए, बेटे हैं रंगदार,

माँ दुखियारी रो रही, हो बेबस लाचार॥

 

जब चाहा  तब रात हो, पलक झपकते भोर,

क्या रखा है गाँव में, चलो शहर की ओर॥ 

 

कर धुएं का नाश्ता, झटपट हो तैयार,

गए पड़ोस की भोज में, लेकर अपनी कार॥

 

आँगन मेरे गाँव का, शहरी फ़्लैट से बीस,

तिलक बराबर हो गयी, पहले क्लास कि फ़ीस॥

 

मंत्री जी की जेब का, कर ना सके जुगाड़,

डिग्री, एम्.ए पास हैं भैया, फिर भी हैं बेकार॥

 

घर की मुर्गी दाल है, ऐसी अपनी सोच,

सौ करोड़ के देस में, रखें विदेशी कोच

 

कुर्सी पर है जो डटा, वही हुआ भगवान्,

भोली जनता रट रही, मेरा देश महान

 

दिल्ली जाकर खो गए, शब्द, भावना, गीत,

त्योहारों पर कभी -कभी, याद आये मनमीत॥

 

अर्थहीन-से हो गए, प्रेम, भक्ति, मुस्कान,

बाजारों में खो गयी, अपनी भी पहचान॥

 

   निखिल आनंद गिरि

जामिया मिलिया इस्लामिया

नयी दिल्ली

 

 

 

कुछ और दोहे

'आजाद' लोभ ना कीजिए, लोभ पाप का मूल

 लोभ के मन मे आत ही, धर्म जाए सब भूल॥ 

 

आजाद' माँगो मत कछु , माँगन से य जाए

 माँगन से ही देखो हरी , वामन थे कहाए॥ 

 

आजाद' अच्छी पुस्तकें, विद्वानों की मीत

 भक्ति-साधन बन सकते है, चित्रकला, संगीत

 

आजाद' जैसे भी भजो, मालिक सब सुन ले

माँ समझे है भाव को, बालक जो भी कहे

 

'आजाद' सुविधा-दुविधा है,समझ लेहो मन माहिं

 अधिक वस्तु के संग्रह में, अधिक बढ़े क‍‍ठिनाई

 

'आजाद' सगाई ना सन्त करें,सिर न बान्धे मोर

पले पलाए ले भागतें, हैं यहीं सन्तो की टौर

 

'आजाद' अपनी भाषा कों, भारतीय रहे है भूल

विदेश जाने के सपने देंख, युवक रहे है झूल

 

'आजाद' अलोचना मत करो, कुछ करो नवीन रचना

दु:ख न देना सुख बांटना, सबसे बड़ी यही अर्चना

 

'आजाद' राजा हो गए , जिन्ह लाई प्रभु से प्रीत

 बाजा उनका बज गया, माया में जिनका चित

 

'आजाद' हिन्दी बोलो सदा, करो हिन्दी का प्रचार

अपनी माँ ही करती हैं, बच्‍चों पर उपकार

 

 

गुरुमुख आजाद
श्री आनंदपुर सत्संग आश्रम
48/18
लक्ष्मी गार्डन

गुड़गाँव, हरियाणा

 

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