कुछ दोहे
एक तरफ हैं चाँद पर, इंसानों के पाँव ।
और इधर अंधेर में, सदियों से हैं गाँव ॥
ना पानी ना सड़क की, कोई करता बात,
हर नेता है पूछता, किसकी क्या है जात ॥
बाप दरोगा हो गए, बेटे हैं रंगदार,
माँ दुखियारी रो रही, हो बेबस लाचार॥
जब चाहा तब रात हो, पलक झपकते भोर,
क्या रखा है गाँव में, चलो शहर की ओर॥
कर धुएं का नाश्ता, झटपट हो तैयार,
गए पड़ोस की भोज में, लेकर अपनी कार॥
आँगन मेरे गाँव का, शहरी फ़्लैट से बीस,
तिलक बराबर हो गयी, पहले क्लास कि फ़ीस॥
मंत्री जी की जेब का, कर ना सके जुगाड़,
डिग्री, एम्.ए पास हैं भैया, फिर भी हैं बेकार॥
घर की मुर्गी दाल है, ऐसी अपनी सोच,
सौ करोड़ के देस में, रखें विदेशी कोच ॥
कुर्सी पर है जो डटा, वही हुआ भगवान्,
भोली जनता रट रही, मेरा देश महान ॥
दिल्ली जाकर खो गए, शब्द, भावना, गीत,
त्योहारों पर कभी -कभी, याद आये मनमीत॥
अर्थहीन-से हो गए, प्रेम, भक्ति, मुस्कान,
बाजारों में खो गयी, अपनी भी पहचान॥
निखिल
आनंद
गिरि
जामिया मिलिया इस्लामिया
नयी दिल्ली
