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वर्ष- 2, अंक - 15, अगस्त, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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 इस अंक में पढिए

 कविताएं....

माह के कवि - विश्वरंजन की समकालीन कविताएँ

पहाड़ की चार कविताएँ - नरेश कुमार उदास

प्रवासी कवि (लन्दन)  - अनुचिंतन - डॉ. ज्ञान प्रकाश सिंह ज्ञानी

प्रवासी कवि (शारजाह) - खिड़की पर बोगनविला - पूर्णिमा वर्मन

 

 छंद.....गीत/दोहे

काश मेरी मुट्ठियों में... - मुकुंद कौशल

अधरों की कोरों से - डॉ. कमलेश व्यास

एक अनूठे छंद को - वीरेन्द्र आस्तिक

आप न आये - परवीन हक़

चंदा की बाहों में - डॉ. गणेशदत्त सारस्वत

गीत में लिखता रहूँगा - डॉ. शरद नारायण खर

आँखों पर है पहरा - सूर्यदेव पाठक 'पराग'

निखिल आनंद गिरि और गुरुमुख आजाद की रचनाएं

 

 

कथोपकथन...

मैं तो व्यक्ति व्यंजक निबंध लिखता हूँ - स्व.विद्यानिवास मिश्र

 (वर्षों पहले हारून रशीन खान द्वारा लिया गया साक्षात्कार)

हम टिप्पणी इसलिए नहीं देना चाहेंगे हर आदमी की एक शैली होती है। मैं साहित्य देता हूँ । साहित्य का एकमात्र प्रयोजन है लोगों को चुनना । अपनी बात कहकर के लोगों को कुछ देना अपना उद्देश्य रहता है। मूल उद्देश्य तो यही है मानव चेतना। तो, बतरस तो माध्यम है, लक्ष्य नहीं है। कुबेरनाथ राय रसात्मक हैं।

 

व्यंग्य

 मुर्गा और आदमी - आर.के.भोनावर

 चिंता जिन करियो, हम हँ न ! - आर. के. भोनावर

 

संस्मरण

खैरागढ़ को याद करते हुए - संजीव बख्शी

बचपन के दिनःयाद आयें पलछिन - आदित्य प्रकाश सिंह

किशन महाराज पिताजी के अंतरंग मित्र हो गये थे। किशन महाराज एवं सितारा देवी हमारे घर में ठहरा करते थे । रात में कभी-कभी किशन महाराज हमारे घर के बड़े कमरे में ही तबले का अभ्यास शुरु कर देते और उनका साथ देतीं नृत्य पर सितारा देवी।

 

बचपन

चौराहों पर ठिठका बचपन - डॉ. महेश परिमल

मौत की सजा - मुकेश नादान

तीन बाल कविताएँ - संजय द्विवेदी

 

भाषांतर....

  पंखिल भावनाओं  का साम्राज्य - जॉन कीट्स

 शहर,सिंहासन और सत्ता - रूडयार्ड किपलिंग

 

 हस्ताक्षर....

प्रकृति के सुकुमार कवि - सुमित्रानंदन पंत - कैलाश जैन

पंत जी ने अपने भावों और विचारों को मूर्तरूप प्रदान करने के दृष्टिकोण से लोकायतन नामक संस्था की शुरुआत की किन्तु इसमें कुछ समय उन्हें खास कामयाबी नहीं मिली। पांडिचेरी के अरविन्द आश्रम में कुछ समय रहने के बाद पंत जी ने स्वयं को अरविन्द-दर्शन से अभिभूत पाया।

 

 विचार....

राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का एक कार्यक्रम -  राजकिशोर

 

 व्याकरण....

खींचना - डॉ. गंगा प्रसाद गुप्त बरसैंया

 

हिन्दी विश्व

राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ एवं हिन्दी - महावीर सरन

प्रवासी साहित्यः हमारा दायित्व - श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी

 

इनदिनों

दलितों का धार्मिक शोषण - विश्वनाथ सचदेव

 

जिंदगी के रंग...

मक्खन,  मिर्च और मठा - किशोर दिवसे

 

तकनीक 

विंडोज़ 98 पर यूनिकोड हिन्दी में काम कैसे करें-रविशंकर श्रीवास्तव

 

 चीन की चिट्ठी -

जरूरत है सिर्फ एक संकल्प की -  राजनंदन

 अमेरिका की धरती से -

अथ से इति तक - लावण्या शाह

 पाकिस्तान डायरी -

'शैतानी' गतिविधियों का केन्द्र - तनवीर जाफ़री

 

संपादकीय

उत्पाद नहीं है साहित्य


जयप्रकाश मानस

 

     साहित्य का आर्थिकीकरण के पीछे दरअसल पूँजीवादी व्यवस्था का हाथ रहा है । वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति से प्रेस स्थापित होने लगे । पुस्तक प्रकाशन उद्योग में तब्दील हो गया । सारी खुरापातियाँ यहीं से शुरू होने लगीं ।

    साहित्य और साहित्यानुरागी अर्थात् रचनाकार और पाठक के बीच प्रकाशक नामक एक लोभी रोजगाराश्रित आ गया । जिसके लिए पेप्सीडेंट और प्रेमाश्रम दोनों ही उत्पाद की वस्तु नज़र आने लगीं।

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लित निबंध/रम्य रचना

अभागी स्त्री - महादेवी वर्मा

सफेद साड़ी के कुछ धबीले बैजनी किनारे से घिरा मुख सुडौल गोरा;  पर बहुत मुरझाया हुआ-सा लगा । नाक के अग्र भाग की लाली हाल ही में पोछें गये आँसुओं की सूचना दे रही थी -- पलकों की कोरें भी शायद रोने से ही कुछ-कुछ सूज आयी थीं, जिससे उनकी मर्मस्पर्शी व्यथा और भी गहरी हो उठी थी। ओठ इतने सूख रहे थे कि उन्हें आर्द्र करने का प्रत्येक प्रयास अपनी एकरसता में भी एक नयी थकान का आभास देता जाता था; मैं स्वयं बहुत क्लान्त थी, इसी से उसके कुछ कहने की प्रतीक्षा में रुकी रही ।

सावन की फुहार में बाबुल का अँगना - गोपीनाथ कालभोर

 

 

कहानियाँ

हिंदी कहानियाँ

कुत्ता - गोवर्धन यादव

पत्थर दिल - सूरज प्रकाश

छः लघुकथाएँ - प्रदीप कुमार

कला की मासूम आँखें - डॉ.बल्देव

स्टेज पर खड़े होकर कवि ने अपने अगल, बगल, अपराधी मुद्रा में खड़े जादूगर और डॉक्टर की ओर जाँचती निंगाहों से देखा। वह उत्तेजित भीड़ के ही पक्ष में निर्णय देना चाहता था, ताकि आगे का शो देखा जा सकें। किन्तु अचानक ही उसके भीतर के न्यायाधीश ने आदेश दिया - दबाव या भावावेश में निर्णय देना उचित नहीं होगा।

आस्ट्रिया की तुर्की कहानी

वाक्य-प्रतिवाक्य - बारबरा फ्रिशमूथ

 

 

संस्कार

कितना गहरा खोदेंगे हम? - अरुंधती रॉय

एक नये समीक्षक को सलाह - जार्ज बर्नार्ड शॉ

  (धारावाहिक - दूसरी किश्त)

 किसी समीक्षक का सर्वोपरि कार्य यह होता है कि वह लेखक की विलक्षण शैली को परम श्रद्धा के साथ स्वीकार करे। वाइल्ड की मेघा और सूक्ष्म साहित्यिक कार्य-क्षमता बड़ी महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति विशिष्ट होता है, उसके पक्ष और विपक्ष दोनों में हर समय व्यर्थ हल्ला हुआ करता है। यदि आप स्वयं विशिष्टता प्राप्त करना चाहते हैं तो इस प्रकार के शोर से आप अपना मस्तिष्क स्वतन्त्र नहीं रख सकते। मेरे कहने का भाव आप समझ रहे होंगे। सराह, ग्रैण्ड, इब्सन, वैग्नर आदि सबों के साथ, जिनमें विलक्षण क्षमता रही है, ऐसा ही होता है।

 

मूल्याँकन

हिन्दी उपन्यास और गाँधीवाद - डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर

राष्ट्रबोध की भावना और साहित्य -  डॉ. विनय राजाराम

ग्लोबलाइजेशन की बात करने वाले साहित्यकार तबके में 'नव-ब्राह्मणत्व' का सा भाव उदय होता चला गया और उसने देश की, देश की अस्मिता की, देश की ह्रासोन्मुखी संस्कृति की चिन्ता करने वाले लेखकों को दोयम दर्जे का लेखक घोषित करके समूचे समय को अनेक प्रकार से गुणात्मक हानि पहुँचाई जिसका आकलन आज नहीं तो कल इतिहास अवश्य करेगा।

 

कृति समीक्षा

प्रवासिनी के बोल - डॉ॰ अँजना संधीर

दूर की आवाज - अलेकसांद

शिवरीनारायणः देवालय और परंपराएँ - प्रो. अश्विनी केशरवानी

द ब्लैक स्वान: द इम्पैक्ट ऑफ़ हाइली इम्प्रोबेबल-निकोलस

 

ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)

कविता कोश - ललित कुमार

रिपोर्टाज-चित्र-विचित्र - तपेश जैन

 ललित निबध- संचयन -  डॉ. शोभाकांत झा

ग़ज़ल-तस्वीर ज़िंदगी के - मनोजभावुक

 

 हलचल - पढ़िए देश-विदेश के सांस्कृतिक समाचार

 

पिछले अंको से

विश्व हिंदी सम्मेलन पर विशेष

ट्रिनिडाड में हिंदी - बच्चू प्रसाद सिंह

गयाना में हिन्दी - नारायण कुमार

वेस्टइंडीज में हिंदी - प्रेम जनमेजय

 हिंदी का भविष्य - जयप्रकाश मानस