|
  
ललित
निबंध/रम्य
रचना
अभागी स्त्री
-
महादेवी वर्मा
सफेद साड़ी के कुछ धबीले बैजनी किनारे
से घिरा मुख सुडौ ल
गोरा;
पर बहुत मुरझाया हुआ-सा लगा । नाक के अग्र भाग की लाली
हाल ही में पोछें गये आँसुओं की सूचना दे रही थी --
पलकों की कोरें भी शायद रोने से ही कुछ-कुछ सूज आयी
थीं, जिससे उनकी मर्मस्पर्शी व्यथा और भी गहरी हो उठी
थी। ओठ इतने सूख रहे थे कि उन्हें आर्द्र करने का
प्रत्येक प्रयास अपनी एकरसता में भी एक नयी थकान का
आभास देता जाता था;
मैं स्वयं बहुत क्लान्त थी, इसी से उसके कुछ कहने की प्रतीक्षा में
रुकी रही ।
सावन की
फुहार में बाबुल का अँगना
-
गोपीनाथ कालभोर
  
कहानियाँ
हिंदी कहानियाँ
कुत्ता
-
गोवर्धन यादव
पत्थर दिल
-
सूरज प्रकाश
छः लघुकथाएँ
-
प्रदीप कुमार
कला की मासूम आँखें
- डॉ.बल्देव
स्टेज पर खड़े होकर कवि ने
अपने अगल, बगल, अपराधी मुद्रा में खड़े जादूगर और डॉक्टर की ओर जाँचती
निंगाहों से देखा। वह उत्तेजित भीड़ के ही पक्ष में निर्णय देना चाहता
था, ताकि आगे का शो देखा जा सकें। किन्तु अचानक ही उसके भीतर के
न्यायाधीश ने आदेश दिया - दबाव या भावावेश में निर्णय देना उचित नहीं
होगा।
आस्ट्रिया की तुर्की कहानी
वाक्य-प्रतिवाक्य
-
बारबरा फ्रिशमूथ
  
संस्कार
कितना गहरा खोदेंगे हम?
-
अरुंधती रॉय
एक नये समीक्षक को
सलाह -
जार्ज बर्नार्ड शॉ
(धारावाहिक - दूसरी किश्त)
किसी
समीक्षक का सर्वोपरि कार्य यह
होता
है कि वह लेखक की विलक्षण शैली को परम श्रद्धा के साथ स्वीकार करे।
वाइल्ड की मेघा और सूक्ष्म साहित्यिक कार्य-क्षमता बड़ी महत्वपूर्ण है।
जो व्यक्ति विशिष्ट होता है, उसके पक्ष और विपक्ष दोनों में हर समय
व्यर्थ हल्ला हुआ करता है। यदि आप स्वयं विशिष्टता प्राप्त करना चाहते
हैं तो इस प्रकार के शोर से आप अपना मस्तिष्क स्वतन्त्र नहीं रख सकते।
मेरे कहने का भाव आप समझ रहे होंगे। सराह, ग्रैण्ड, इब्सन, वैग्नर आदि
सबों के साथ, जिनमें विलक्षण क्षमता रही है, ऐसा ही होता है।
  
मूल्याँकन
हिन्दी उपन्यास और गाँधीवाद
-
डॉ. चंद्रकांत
बांदिवडेकर
राष्ट्रबोध की भावना और साहित्य
-
डॉ. विनय राजाराम
ग्लोबलाइजेशन की बात करने वाले
साहित्यकार तबके में 'नव-ब्राह्मणत्व'
का सा भाव उदय होता चला गया और उसने
देश की, देश की अस्मिता की,
देश की ह्रासोन्मुखी संस्कृति की
चिन्ता करने वाले लेखकों को दोयम दर्जे का लेखक घोषित
करके समूचे समय को अनेक प्रकार से गुणात्मक हानि
पहुँचाई जिसका आकलन आज नहीं तो कल इतिहास अवश्य करेगा।
  
कृति समीक्षा
प्रवासिनी के बोल
-
डॉ॰ अँजना संधीर
दूर की
आवाज -
अलेकसांद
शिवरीनारायणः देवालय और परंपराएँ - प्रो.
अश्विनी केशरवानी
द
ब्लैक स्वान: द इम्पैक्ट ऑफ़ हाइली इम्प्रोबेबल-निकोलस
  
ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)
कविता कोश
-
ललित कुमार
रिपोर्टाज-चित्र-विचित्र
-
तपेश
जैन
ललित निबध- संचयन -
डॉ. शोभाकांत झा
ग़ज़ल-तस्वीर
ज़िंदगी के -
मनोजभावुक
  
हलचल
- पढ़िए
देश-विदेश के सांस्कृतिक समाचार
  
पिछले अंको से
विश्व हिंदी सम्मेलन पर विशेष
ट्रिनिडाड
में हिंदी
-
बच्चू
प्रसाद सिंह
गयाना में हिन्दी
-
नारायण कुमार
वेस्टइंडीज में हिंदी
-
प्रेम जनमेजय
हिंदी का भविष्य
- जयप्रकाश मानस
  
|