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।। उत्पाद नहीं है साहित्य ।।
साहित्य
माँ की कोख है, परिवार है, जहाँ मनुष्य का सच्चा जन्म होता है।
साहित्य वह पाठशाला है, जहाँ
एक आस्थावान पाठक के
रूप में पहुँचकर
मनुष्य सार्थक रूप से
स्वयं को शिक्षित पाता है ।
दीक्षित होता है । साहित्य का गुरु-वाणी का समुच्चय ही
है । साहित्य पड़ोस है, जहाँ हम
अपनी क्रीड़ाओं के लिए चले जाते हैं ।
इन्हीं क्रीड़ाओं के दरमियान हार-जीत के मध्य समन्वय
का भाव मन-मनीषा में रुचिकर लगने लगता है । साहित्य
परदेश में रह-रहकर याद आने वाला
एक गाँव भी है, जिससे दूर होकर भी हम सदा निवसते हैं । साहित्य
में समूची रिश्तेदारी होती है, यहाँ कोई मामा होत
है, कोई
काका, कोई बुआ, कोई लंगोटिया यार, तो कोई प्रेयसी,
जिसकी चाह में कई बार पूरी ज़िंदगी गुजर जाती है । कुछ
से बनती ही नहीं और कुछेक के बिना जीवन दूभर हो जाता
है । साहित्य एक साँस है जो रसिकों में निरंतर
प्रवाहमान है । साहित्य वह लाल रुधिर कणिका है जो अपने
चहेताओं के आसन्न संकट के
वक्त उसके प्रतिरोधी बल को
तेज कर देता है ।
साहित्य सिर्फ अक्षरों का ताना-बाना नहीं है । वह भाववीरों की कलाबाजी मात्र नहीं । वह हार्दिक संबोधन है । वह उजियारे का गीत है । वह विपरीत घडियों वाला आर्तनाद है । अपनी समग्रता में वह जीवन जीने की कला है और उसके भी कहीं आगे का विज्ञान । वह पीछे निहारने वाला पुरातत्वशास्त्र भी है । वह मनुष्यता का व्याकरण है । वह उदात्तता का छंद है । वह मुक्ति का संगीत है । कुछ लोग उसे केवल चित्ताकर्षक शब्दों का शिल्प बताकर जानबूझकर कमतर आँकते हैं । वे ऐसे वक्त अक्सर भूल जाया करते हैं कि साहित्य सभ्यता का भी शिल्प है। प्रकारांतर से विकसित मनीषा का शिल्पी है साहित्य । सभ्य मन का शिल्पी भी है साहित्य । इतिहास में इसकी प्रमाणित गवाहियाँ हैं । और इतना ही क्यों, जिसे हम (सभ्य ?) असभ्य कहते रहे हैं, उस लोक की भी जीवंतता का दस्तावेज है साहित्य। सच तो यह है कि अपने साफ-सुथरे और सरल-तरल रुपों में साहित्य लोक में सर्वत्र और ज्यादा सघन रहा है । सच यह भी है कि बिना लोक को जाने किसी भी भाषा के साहित्य के जड़ों तक पहुँचना कठिन सा है । आज का सबसे बड़ा संकट यही है कि इस समय सभी मुल्कों और समाजों में साहित्य को जीवन से परे माना जा रहा है । गोया साहित्य जीवन के लिए अस्पृश्य हो गया हो ।
उत्तरआधुनिक मानसिकता वाले क्रूर और अंध समय के दबाबों के बावजूद लोक की बात जब निकल ही पड़ी है तो क्यों न हम अपने-अपने लोक की उस बगिया की ओर निहार लें जो सदा-सर्वदा हरी-भरी रहती थी । सुख में भी । दुख में भी । अपने जटिल और दुष्कर जीवन में विडम्बनाओं के स्थायी भाव के बीच भी लोक आखिर जीवन जीने का बेहत्तरीन ढंग तलाश ही लेता था - कभी खेतों में निंदाई-गुड़ाई करते समय कहावत कहकर । कभी पहेली बूझकर तो कभी उमड़ते-घूमड़ते बादल को देखकर बिरहा या कजरी गाकर । दिन भर हड़तोड़ मेहनत के बाद जब घर लौटता तो अँगीठी के पास चुपचाप जा बैठता था – इतने में नानी आ डंटती और जाने कितने तरह की कथाएं शुरू हो जाती थीं । जाने कब निंदिया रानी के गोद में वह चला जाता, पता ही नहीं चलता । उसे इल्म भी नहीं होता उस वक्त और वह बड़ी से बड़ी बातें रच लेता था – वह लोक का साहित्य ही तो था आखिर । वह लोक-साहित्य ही था जिससे वह जीवन का मंत्र सीख लेता था । अपने संघर्षों को धारदार बना लेता था । लोक की उपस्थिति साहित्य से पहले की है । लोक को तो साहित्य की भी छट्ठी-बरही याद है । लोक का सबसे बड़ा सत्य यह है कि वह सदा वर्तमान होता है । वह भूतकाल में नहीं जाता । वह सदा सातत्य है । जिसे हम आज आधुनिक कह रहे हैं । कल वही लोक में जा मिलेगा । ऐसे में कुछ ही वर्ष बाद चखे हुए फल के स्वाद को तिरस्कृत करना पागलपन के अलावा कुछ भी नहीं है ।
जब कभी मैं फूर्सत की झील के पास होता हूँ और ख़ुद से ही उत्तर उगलवाने के लहरों पर सवार हो उठता हूँ तो आश्वस्त होने लगता हूँ कि साहित्य एक निर्मल धारा है संस्कारों की, जिससे मैं कम से कम मनुष्य होने का अनुभव तो कर सकता हूँ । यह यथार्थ होते हुए भी स्वप्नों का ऐसा तारामंडल है जहाँ से फूटती हुई रोशनी मेरे पथ को आलोकित करती जान पड़तीं हैं । यह कल्पनात्मक उड़ान होते हुए भी पैर रखने के लिए यथार्थ की ज़मीन देता है । साहित्य है तो दुनिया के भीतर ही, पर वह दुनिया के बाहर भी है । उसकी परिधि दुनिया के परिधि से कहीं वृहत्तर है। उसे सीमित करके देखना असम्भव ही नहीं दुष्कर भी होगा । वैसे तो साहित्य की मृत्यु भोज तक कुछ विचारकों ने खा लिया है । कुछ अभी भी उसे नेस्तनाबूद देखने के लिए तर्कों और दुष्चर्कों में उलझाते रहते हैं पर लगता नहीं कि साहित्य कभी अपने जीवन के अंतिम छोर पर होगा । वह हर वक्त अवतरित होता है । नये वस्त्र धारण कर । नया रूप धारण करके। आत्मा की तरह । साहित्य मूलतः आत्मीय कर्म है । वह तब तक पल्लवित होता रहेगा, जब तक मनुष्य के मन में रस का कोई कोना बचा रहेगा । चाहे मनुष्य कितना भी मशीनी न हो जाये, हर बार उसे मन के पास लौटना होगा । तब उसके मन के लिए खुराक लेकर सिर्फ साहित्य भी स्वागत में खड़ा मिलेगा ।
साहित्य दृष्टि है जिससे मैं दुनिया को देख सकता हूँ – आर-पार और सिर्फ इतना ही नहीं, उस भूगोल में भी स्वयं को खड़ा पाता हूँ जहाँ न कभी मैं था और न ही जहाँ मेरे होने की संभावना है । साहित्य सिर्फ़ दृष्टि ही नहीं, साहित्य सृष्टि भी है - सृष्टि के भीतर एक और सृष्टि । समानानांतर । साहित्य श्रवण-शक्ति है जिससे नहीं सुनाई देने वाली चीख-पुकार भी सुनाई दे जाती है । साहित्य के सम्मुख शरणागत होना शंकर जैसा हो जाना है । कहते हैं शंकर के तीन नयन थे । वे अतीत, आगत और अनंत तक पहुँच रखते थे । वे जब अपना तीसरा नेत्र खोलते थे तो प्रलय मच जाता था । कलुषताएं स्वयंमेव भस्मीभूत हो जाया करती थीं । साहित्य के जितना समीप मैं पहुँचता हूँ स्वयं को शंकर के करीब पाता हूँ । मन का अदृश्य अंधेरा एकबारगी दिखाई देने लगता है । सारी नादानियाँ, कमजोरियाँ, लाचारियाँ और कलाबाजियाँ एकबारगी मुझे कचोटने लगती हैं ।
मेरे कुछ मित्र अक्सर फब्तियाँ कसते हैं – साहित्य से पेट भरता है क्या ! वैसे तो उनके भी शब्द होते हैं बड़े सच्चे, बड़े यथार्थवादी । पर यह मैंने कब माना कि पेट भरना ही मेरी अंतिम साधना है । समझ नहीं आता मुझे कि मैं उनके जैसे क्यों नहीं सोचता - जैसे मैं एक मनुष्य होने के वास्ते सिर्फ़ पेट भरने के लिए हूँ । और यही मेरा भी चरम ध्येय होना चाहिए । आप मेरे मित्रों को विपरीत कोणों से मत देखिए । वे मनुष्य ही हैं । जैसा मैं या आप । मनुष्य होना भी क्या अंतिम लक्ष्य है जीवन का ? शायद नहीं । दैहिक रूप से मनुष्य तो आप हैं ही - नियति से या माता-पिता के संसर्ग के परिणामस्वरूप । इस पर आपके इतराने के लिए कौन-सी अतिरिक्त बात है ? पर दैहिक रूप से अन्य कई प्राणी हैं ।
साहित्य उत्पाद नहीं बल्कि रचना है । वह कोई जींस नहीं कि जब चाहे स्वीच ऑन करके उसे पैदा किया जा सके। साहित्य न अर्थशास्र है न वाणिज्य । साहित्य को मूलतः बाजार-विरोधी घटना कहा गया है । साहित्य के परिसर में विलमना और वहीं घर बना लेना कबीर होना है । कबीर ने भरे बाजार में खड़े होकर कहा था – जो घर जारै आपनो चलो हमारो साथ । जब घर ही जला देना है तो बाजार की जरूरत ही क्या है ? वस्तुतः साहित्य का मर्म बाजार की शक्तियों को नष्ट करने से रहा है और आदमी-आदमी के मध्य एक नातेदारी स्थापित करने का रहा है । कबीर जीवन भर उस साहित्य की ही बात करते रहे जहाँ न घर की जरूरत रह जाये न ही बाजार की । साहित्य को जो भी सिक्कों से तौलना की कोशिश करता होता है वह कबीर के विरोध में जाता होता है । और ऐसे बाजारू बुद्धि के मित्र ही अक्सर रोड़े खड़े करते हैं कि साहित्य से पेट भरता है क्या !
साहित्य का आर्थिकीकरण के पीछे दरअसल पूँजीवादी व्यवस्था का हाथ रहा है । वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति से प्रेस स्थापित होने लगे । पुस्तक प्रकाशन उद्योग में तब्दील हो गया । सारी खुरापातियाँ यहीं से शुरू होने लगीं । साहित्य और साहित्यानुरागी अर्थात् रचनाकार और पाठक के बीच प्रकाशक नामक एक लोभी रोजगाराश्रित आ गया । जिसके लिए 'पेप्सोडेंट' और ‘प्रेमाश्रम’ दोनों ही उत्पाद की वस्तु नज़र आने लगीं । बेचारे पाठक के लिए साहित्य खरीदने का असबाब हो गया । और आज का सारा संसार अब तो अर्थशास्त्र के इशारों से ही मन के हर भाव को देखने लगा है, जहाँ अल्प साधन और साधना से अधिकाधिक अर्जित करने की नई तालीम दी जा रही है । नयी पीढ़ी भी इसमें अपनी प्रवीणता समझने लगी है । आज रचा जा रहा साहित्य (?) भी इसी दबाब की उपज (रचना नहीं )है ।
तो साहित्य से रोटी नहीं मिलती । साहित्य कपड़ा या मकान भी नहीं जुटाता । ठीक है । पर यह एक आभासी सत्य है । कहिए कैसे ? आप जो रोटी खाते हैं, उससे जीवन भर की भूख तो मिटती नहीं । जिस वस्त्र के लिए आप बड़े-बड़े माल्स की गलियों में घंटों भटकते हैं, जिस मकान के लिए आप कई दिनों तक टाईल्स छाँटने में ही अपना समय गुजार देते हैं वह भी एक दिन आपको बोर लगने लगता है । जिस वैभव के पीछे आप मरे जाते हैं । रात-दिन गणितबाजी करते फिरते हैं वह एक दिन फेल ही हो जाता है । आप सामान्य मनुष्य की तरह चार कंधों पर सवार होकर मिट्टी की नदी में जा मिलते हैं । सारा तामझाम यहीं छोड़कर । चाहते तो हैं सब कुछ अपने साथ ले जायें पर ले जा नहीं पाते । ऐसा संभव भी नहीं है । माना ऐसा नहीं भी चाहते हैं तो जिस जोड़तोड़ में आपको रस आता रहता है वह भी तो एक दिन निथर जाता है । आप उस आनंद से पूर्णतः वंचित हो जाते हैं । क्या यह आपका भी शाश्वत यथार्थ नहीं है ! कदाचित् आप सोच रहे हों कि मैं अध्यात्म की सोच रहा हूँ । आपको भौतिक संसार से भ्रमित कर रहा हूँ । सच मानिए- मैं अध्यात्म की एबीसीड़ी भी नहीं जानता । आपकी सों कि मैं किसी भी तरह से आपको संसार से दूर नहीं ले जाना चाहता हूँ । मैं तो संसार को बनाना चाहता हूँ । सदा-सदा के लिए । आप इस संसार में सदैव बसे रहे । मैं तो आपकी उपस्थिति को चिरस्थायी देखना चाहता हूँ । कदाचित् यही वह अंतर है आप और मेरे बीच है और जो कदाचित् साहित्य के कारण है । आप मुसाफ़िर की तरह चल देना चाहते हैं । मैं स्थायी निवासी बनना चाहता हूँ। लोग भले ही मरते चले जायें मैं मरना नहीं चाहता । हम न मरिहैं मरिहैं संसारा । आप कतई भ्रम न पालें कि मैं अमरत्व चाहता हूँ । अमरत्व की सबसे बड़ी विशषता है कि वह चाहत की दासी नहीं है । वह तो त्याग का दूसरा नाम है । त्याग का चरमोत्कर्ष अमरत्व का अर्थ है । वह अपने अस्तित्व के निवारण का पर्याय है । वह मरण के बाद जीवन है । साहित्य मरण के बाद भी जीवन का मंत्र सिखाता है । साहित्य अजस्त्र जीवन है ।
बात रोटी, कपड़ा और मकान से चली थी । तो ये सब तो आम मनुष्य भी बड़ी सरलता से एकत्र कर लेता है । बल्कि सभी मनुष्य कर लेते हैं । श्वान-सूकर भी । साहित्य औरों के लिए रोटी की जुगाड़ करता है । साहित्य बेघरवारों के लिए भी घर तलाशता है । साहित्य नंगों के लिए कपड़े जुटाने पर जोर देता है । साहित्य औरों के हित की चिंता है। चिंता भी नहीं चिंतन है । साहित्य का एक मतलब सहित भी है । वह इन्हीं कोणों से साहित्य है ।
साहित्य में होना लेखक होना मात्र नहीं है । पाठक होना मात्र नहीं है । साहित्य में होना सहित मैं होना भी है । यह साथ में होना भी है । जो साहित्य में नहीं होता शायद वह अकेले होता है । सब कुछ होते हुए भी अकेला । राबिंसन क्रूसो की तरह नितांत अकेला एक सूनसान टापू में । नीरस, निरूद्देश्य, निराकार । साहित्य संपूर्ण आकार के साथ है । साकार है जो उस निराकार के लिए रास्ता गिनाता है जिसे मनुष्य अभी तक नहीं पाया है । यदि वह उस आकार तक स्वयं को पहुँचा चुका होता तो शायद आज इतना कुरूप नहीं दिखाई देता । साहित्य में उपस्थिति का एक अर्थ सकारात्मक रास्तो के लिए चलना भी है । साहित्य की उपेक्षा वही करता है जिसे सकारात्मक राहों पर चलना नहीं आता । और जिसे सकारात्मक राहों पर एक बार विश्वास हो जाता है उसे हर चीज़ में पद, प्रतिष्ठा, पैसा का प्रश्न दिखाई नहीं देता । वह मन के आनंद के लिए अवकाश भी खोजता है । साहित्य कम से कम ऐसा अवकाश तो है ही जहाँ आनंद ही आनंद है ।
जाने क्यों, पर मुझे बहुधा यही लगता है कि साहित्य अघोर कर्म है । बिल्कुल सहज, बिलकुल सरल बन जाना। अघोर का मतलब भयानक या जटिल नहीं होता । अघोरी का असली अर्थ ‘और घर’ है । अर्थात् दूसरों के घर में रहने वाला । दूसरों के लिए कल्याणकारी । शंकर इसलिए अघोरी नहीं कहलाते कि उनके कपड़े लत्ते भोजन-पानी का ठिकाना नहीं बल्कि इसलिए कहलाते हैं क्योंकि उनसे दूसरों की पीड़ा सही नहीं जाती । विश्वास है - फट से चले आते हैं दूख हरने । साहित्य यही पाठ पढ़ाता है । कम से कम मैं जितना साहित्य को समझ सका हूँ – साहित्य मुझे अघोरियों का काम ही नज़र आता है । साहित्य का सच्चा अनुयायी अपनी सुधि कम औरों की सुधि ज्यादा रखने लगता है । और यही साहित्य का ताकत है, प्रभाव है । किसके पास है ऐसी ताकत !
जयप्रकाश मानस
1 अगस्त, 2007
