व्यंग्य के नये प्रतिमानों का सृजन

प्रकाशन :18-04-2012
कृष्ण कुमार अग्रवाल

विनाश वाचस्पति अन्नाभाई बेवजगत का सुपरिचित चेहरा है। इंटरनेट पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार तथा समसामयिक तथा सामाजिक मुद्दों पर उनके वैचारिक आंदोलनों को काफी लोकप्रियता मिली है। व्यंग्य लेखन उनका प्रिय शगल है और उनके व्यंग्यों में उनका व्यंग्य विधा के प्रति समर्पण और प्यार झलकता है। अभी-अभी उनका व्यंग्य संग्रह ‘व्यंग्य का शून्यकाल’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।

हमारे समय और समाज के लगभग सभी मुद्दे उनके व्यंग्यों में प्रस्तुत हुए हैं। इन व्यंग्यों में लेखक एक तरफ जहाँ राजनीतिक विद्रूपताओं पर करारे प्रहार करता है वहीं सामाजिक स्तर पर भी अनेक समस्याओं को ये व्यंग्य उभारते हैं। भ्रष्टाचार तथा मंहगाई उनके प्रिय विषय हैं जो इन व्यंग्यों में निशाने पर हैं। ‘दाल का अरहरापन’, ‘अरे महंगाई रुक’, ‘प्याज-पैट्रोल तकरार’, ‘भ्रष्टाचार के मुंह पर’, ‘भ्रष्टाचार की जय बोल’ आदि व्यंग्य उल्लेखनीय है।

जादू की छड़ी’ शीर्षक व्यंग्य सरकार द्वारा हाल ही में गरीबी की परिभाषा के यथार्थ को सामने लाता है। धार्मिक तथा सांस्कृतिक जगत की विकृतियों पर भी अविनाश की नजर बराबर है। ‘चलो, बाबा बन जाते हैं’ शीर्षक व्यंग्य में वे यह कहने से नहीं चूकते कि ‘बाबा की इतनी संपत्ति देखकर देश के उन भ्रष्ट नेताओं को शर्म आ रही होगी कि वे इतनी संपत्ति नेतागिरी में नहीं जुटा पाए जितनी अकूत संपत्ति बाबा ने बाबा बनकर जुटा ली और उस पर भी तुर्रा ये है कि उन पर न तो किसी किसी अन्ना और रामदेव ने ऊंगली उठाई हो।’ अविनाश जी का प्रहार किसी लाज-लिहाज को ध्यान में नहीं रखता। साधु को स्वादु की संज्ञा देना साहस का काम है। अविनाश अपनी बात को स्पष्ट शैली में कहते हैं। यहां शब्दाडंबर न होकर शब्द-चमत्कार अवश्य है। अत्याधुनिकता तथा तकनीकी-वैज्ञानिक प्रगति के श्वेत-स्याह पहलुओं को भी इन व्यंग्यों में अभिव्यक्त किया गया है।

अविनाश की भाषा का लचीलापन तीखेपन को कम नहीं होने देता अपितु विसंगति पर घुमावदार चोट करता है। उनकी भाषा में जादू है। शब्दों का चयन और उनकी तुकबन्दी से नये अर्थों का सृजन पाठक को बांधता है। लक्षणा और व्यंजना शब्दशक्ति का अद्भुत प्रयोग करते हुए अविनाश नवीन प्रतीकों और बिम्बों को उपयोग में लाते हैं। ये व्यंग्य, व्यंग्य के नये प्रतिमानों का सृजन करते हुए पुराने मानकों को तोड़ते प्रतीत होते हैं। उनकी भाषा का सौंदर्य दृष्टव्य है- ‘भारत की सुरक्षा व्यवस्था कुत्तों के मजबूत कंधों पर टिकी हुई है, जो बाकी बची है वो उसकी पूंछ के समान टेढी है।’ व्यंग्य विधा जिस तटस्थता और निर्भीकता की मांग करती है, वे अविनाश के व्यंग्यों में बखूबी मिलती है। व्यंग्य विधा में बहुधा दोगले तथा दोहरे अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग होता रहा है परंतु अविनाश के व्यंग्य कहीं भी साहित्यिक मर्यादाओं का हनन नहीं करते।

संग्रह में संकलित व्यंग्य देश की नामी-गिरामी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। हिन्दी में व्यंग्य विधा के शून्य को भरने का स्तुत्य प्रयत्न ‘व्यंग्य का शून्यकाल’ के रूप में अविनाश वाचस्पति की उपलब्धि कहा जाना चाहिए।

पुस्तक-व्यंग्य का शून्यकाल (व्यंग्य संग्रह),
लेखक-अविनाश वाचस्पति
प्रकाशक-ज्योतिपर्व प्रकाशन, 99, ज्ञानखंड-3, इंदिरापुरम, गाजियाबाद-201 012
मूल्य-99 रुपये, पृष्ठ सं. 105

  कृष्ण कुमार अग्रवाल
शोधार्थी,
हिन्दी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र,
1163, सेक्टर-13,
कुरुक्षेत्र-136 118,
मो. 90342-86388
aggarwalkk83@gmail.com
 
         
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