गुलमोहर गर्मियों के
यदि हम अपने आप में वह संघर्ष क्षमता सँजो लें जो गुलमोहर ने सँजोई है तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब तपन अपनी निरर्थकता समझ ले। गुलमोहर की तरह बिना मुरझाए यदि हम अपनी कांति बरकरार रख सकें और जूझते रहें लू के थपेड़ों से तो बहुत मुमकिन है कि गर्मी हम पर हावी न हो। ... पढ़िए
बाजार की हमलावर घेरेबंदी
काजी नजरूल इस्लाम
नजरूल के गांव चुरुलिया में ही उनके नाम पर विश्वविद्यालय बनेगा। पता नहीं, क्या हुआ और किसने उन्हें समझा दिया कि पिछले साल उन्होंने घोषणा कर दी कि यह उनके गांव नहीं, आसनसोल में बनेगा। उन्होंने बिना सोचे-समझे यह घोषणा भी कर दी कि चुरुलिया में जमीन नहीं है। अब सवाल है, जब गांव में जमीन नहीं है तो शहर में कैसे जमीन उपलब्ध होगी? पर इसके पीछे हकीकत कुछ और ही है। ... पढ़िए
स्त्री स्वर की दस्तक
हिन्दू-मुस्लिम प्रेमकथा में लेखिका ने कुछ अनछुए पहलू को उठाने की कोशिश की है, पर ऐसा करने के प्रयास में कहानी कई जगह बोझिल-सी होती हुई आखिरकार थोड़ा फिल्मी हो जाती है। नायक-नायिका का एक-दूसरे के जाति-जगत/धार्मिक खानपान की मीमांसा करते समय कहानी न केवल थोड़ी ऊब पैदा करती है, बल्कि आरोपित सी होने लगती है ... पढ़िए
केन्द्र और राज्य में कांग्रेस और भाजपा
आज जब केन्द्र और राज्य, इन दोनों सरकारों के खिलाफ नौ-नौ बरस के कार्यकाल को लेकर कहने के लिए विपक्ष के पास ठोस बातें होनी चाहिए, तब अगर ये दोनों पार्टियां अपने लंबे अनुभव के बावजूद अगर तथ्यों के बजाय नारों की बातें करती हैं, तो हमारा अंदाज यह है कि मतदाताओं पर उसका असर अब कम होता है। ... पढ़िए
स्पाइज़ ऑफ़ द सोल
लोकायुक्त
एक दिन वे सब जमा होकर अजगर के पास आये और अपनी व्यथा सुनायी कि आपके कारण हमारा जीना मुहाल है। अजगर ने पूरी बात सुनी। विचार करने का पोज लिया और लंबी गर्भवती चुप्पी के बाद बोला - हो सकता है, मुझसे कभी गलती हो जाती है। जब भी मेरे विरुद्ध कोई शिकायत हो, आप गुफा में आ जाइए। मैं चौबीसों घंटे उपलब्ध हूं। ... पढ़िए
शब्द और सत्य
एक बेटी की विदा का शिलालेख!
क्यों कि तब1862 में ज़फ़र की आज़ादी की लगाई आग देश में बुझी नहीं और ब्रिटिश बहादुरों को तमाम जतन के बाद भी देश छोड़ कर जाना पड़ा था। तो क्या यह सरकार बहादुर शाह ज़फ़र की शहादत को, उस इतिहास को दुहराने की राह पर है? और उसी धुन में मगन निरंतर अपने दूध को काला बताने और जीत लेने की फ़िक्र में है? ... पढ़िए
आधे मौके महिलाओं के लिए मप्र से उठी एक अच्छी मिसाल
सरकारी तामझाम के साथ मुख्यमंत्री या मंत्रियों की मौजूदगी में एक साथ वे शादियां निपट गईं, तो समाज के गरीबों का पैसा बचा, या कर्ज लेने की नौबत बची। इसी तरह मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों जगह लड़कियों और महिलाओं के लिए कई तरह की योजनाएं ऐसी शुरू हुई हैं, जो कि देश के दूसरे बहुत से राज्यों में नहीं हैं। छत्तीसगढ़ में महिलाओं को सरकारी नौकरियों में जगह देने के लिए उनकी उम्र सीमा में इतनी बड़ी छूट दी गई है, कि महिलाएं अपने बच्चों को बड़ा करने के बाद भी नौकरी में आने की कोशिश कर सकती हैं। ... पढ़िए
प्राण शर्मा की ग़ज़ल
काव्येतिहास में महेन्द्रभटनागर का रचना-जगत
दूसरे शब्दों में कहें तो वे नवजागरण की कर्मभूमि से रचनात्मक शक्ति का अवगाहन करते दिखाई देते हैं। निराला का रचनात्मक नवजागरण परवर्ती कवियों का मार्गदर्शन करता दृष्टिगत होता है, अतः डॉ. महेंद्रभटनागर का निराला-नवजागरण से प्रभावित होना स्वभाविक ही है। हिन्दी काव्य-साहित्य में यह एक नया मोड़ था। ... पढ़िए
भटकाव का शिकार माओवाद
लड़ाई की आंच अब बड़े नेताओं तक भी पहुंच रही है। इस घटनाक्रम की व्याख्या कई तरह से की जा सकती है। एक व्याख्या यह हो सकती है कि शस्त्र, इच्छाशक्ति आदि के मामले में सुरक्षा बल या माओवादियों के प्रतिस्पर्धी उन पर भारी पड़ रहे हैं। लेकिन माओवादियों के पास भी कोई कम बड़ा शस्त्र भंडार नहीं है। उनके लड़ाके भी कोई कम कुशल नहीं हैं। साथ ही वे एक खास विचारधारा से प्रभावित हैं, जो उनके लिए सुविधाप्रद बात है। ... पढ़िए
असगर अली इंजीनियर नहीं रहे
मुंबई। बड़े इस्लामिक विद्वान के रुप में पहचाने जाने वाले असगर अली इंजीनियर अब नहीं रहे। लंबी बीमारी से जूझते हुए मंगलवार को उनकी मौत हो गई। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार 73 साल के इंजीनियर ने मंगलवार सुबह सांताक्रूज स्थित अपने घर में अंतिम सांस ली। ... पढ़िए
पाकिस्तानी चुनाव अभियान: आतंकवादी अपने उद्देश्यों में स्पष्ट हैं, लेकिन क्या हम भी हैं?
झारखण्ड में संताली फिल्मोद्योग को बढ़ावा देने की जरुरत-बाबू लाल मराण्डी
झारखण्ड। इण्डोर स्टेडियम दुमका में नेशनल संताली फिल्म महोत्सव -2013 समापन सत्र के अवसर पर उपरोक्त बातें जेवीएम सुप्रिमों सह राज्य के पूर्व मुख्य मंत्री बाबू लाल मराण्डी ने कही। वतौर मुख्य अतिथि अपना उद्गार प्रकट करते हुए कहा श्री मराण्डी ने कहा तकनीकी दृष्टिकोण से उन्नत बनाते हुए फिल्म के बाजार निर्माण व आम लोगों तक इसकी पहुँच बनाने की जरुरत है ... पढ़िए
या तो कांग्रेस का आक्रामक घमंड बदलेगा, या फिर अगले चुनाव में...
इस बात पर भी किसको भरोसा होगा कि सोनिया गांधी एक मनाही सुनकर भी मनमोहन सिंह जैसे आधारहीन नेता को बर्दाश्त करने पर बेबस होंगी। इसलिए अभी भी हमारा यही मानना है कि यूपीए और कांग्रेस के भीतर आज जो कुछ हो रहा है वह या तो सोनिया की मर्जी है, या फिर वे उसके लिए सहमत हैं। इससे कम इस पार्टी और गठबंधन में और कुछ नहीं हो सकता। आज हालत यह है कि यूपीए के दो केबिनेट मंत्रियों पर बड़ी-बड़ी तोहमत अदालत में लग रही है और सीबीआई के मामले में नाम जुड़ रहा है, इसके बावजूद मंत्रिमंडल की कोई बैठक नहीं हुई, यूपीए गठबंधन की कोई बैठक नहीं हुई ... पढ़िए
रीतिकालीन कविता का राजनीतिक पक्ष
जंगल में स्वतंत्र रहता है। इससे ज्यादा चिन्ता मैथिलीशरण गुप्त के पास भी नहीं थी। स्वाधीनता के महत्व का गान कर रहे थे दीनदयाल गिरि। ऐसी कविता और ऐसे काल को रामचंद्र शुक्ल के कह देने से गरियाने का काम पिछले सौ साल से हो रहा है। ये कवि तो अपनी अंग्रेजी राज की पहचान कर रहे हैं, ... पढ़िए
कांग्रेस की झुलसी चमड़ी के लिए मरहम, और भाजपा के लिए सबक
चुनावी आंकड़े हकीकत से अलग भी रहते हैं, और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा के कपूत येदियुरप्पा ने यह जीत अपनी पिछली पार्टी से छीनकर, तश्तरी पर धरकर कांग्रेस को तोहफे में दी है। इसलिए इसे लेकर कांग्रेस को कोई खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए। और यह भी तय है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को कर्नाटक की आज की जीत से कोई बड़ा फायदा भी नहीं मिलने वाला है, बल्कि कर्नाटक के भाजपाई भ्रष्टाचार जैसा कोई मुद्दा बाकी देश में यूपीए-विरोधी राज्यों में नहीं रहने वाला है ... पढ़िए
छाया भी साथ छोड़ देती है
छत्तीसगढी़ फिल्मों के लिए सिनेमाघर सबसे बड़ी जरूरत
रायपुर। छत्तीसगढ़ी फि ल्मों के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता सिनेमाघरों की है। अभी करीब 36 सेंटर है इस·की संख्या 150-200 हो जाए तो छत्तीसगढ़ी सिनेमा का उत्थान हो जायेगा। उक्त विचार सिनेमा के सौ साल और छत्तीसगढ़ी फिल्म विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने व्यक्त किए। ... पढ़िए
यदि हम अपने आप में वह संघर्ष क्षमता सँजो लें जो गुलमोहर ने सँजोई है तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब तपन अपनी निरर्थकता समझ ले। गुलमोहर की तरह बिना मुरझाए यदि हम अपनी कांति बरकरार रख सकें और जूझते रहें लू के थपेड़ों से तो बहुत मुमकिन है कि गर्मी हम पर हावी न हो। ... पढ़िए0 टिप्पणी, आलेख, (0 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 23 मई 2013,
नर्मदा प्रसाद उपाध्याय
बाजार की हमलावर घेरेबंदी
और उपभोक्ता अदालतें इतने गिने-चुने मामलों को देखती हैं, कि उसका कोई असर देश के बाजार पर नहीं पड़ता। जिस मीडिया से ऐसे मामलों में जागरूकता की उम्मीद की जाती है, उसे भारत का विज्ञापन बाजार बताता है कि उसे क्या लिखना है और क्या दिखाना है। इससे भी बढ़कर आजकल भारत का मीडिया खुद होकर जाकर विज्ञापनदाता को बताता है कि वह किस तरह एक नया निर्मल बाबा खड़ा कर सकता है।आज जरूरत इस बात की है कि ग्राहकों के बीच से कुछ ऐसे चौकन्ना लोग उठकर खड़े हों, ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (3 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 23 मई 2013,
सुनील कुमार
काजी नजरूल इस्लाम
0 टिप्पणी, संस्मरण, (16 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 22 मई 2013,
संजय कृष्ण
स्त्री स्वर की दस्तक
हिन्दू-मुस्लिम प्रेमकथा में लेखिका ने कुछ अनछुए पहलू को उठाने की कोशिश की है, पर ऐसा करने के प्रयास में कहानी कई जगह बोझिल-सी होती हुई आखिरकार थोड़ा फिल्मी हो जाती है। नायक-नायिका का एक-दूसरे के जाति-जगत/धार्मिक खानपान की मीमांसा करते समय कहानी न केवल थोड़ी ऊब पैदा करती है, बल्कि आरोपित सी होने लगती है ... पढ़िए0 टिप्पणी, पुस्तकायन, (8 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 22 मई 2013,
प्रियंका गुप्ता
केन्द्र और राज्य में कांग्रेस और भाजपा
आज जब केन्द्र और राज्य, इन दोनों सरकारों के खिलाफ नौ-नौ बरस के कार्यकाल को लेकर कहने के लिए विपक्ष के पास ठोस बातें होनी चाहिए, तब अगर ये दोनों पार्टियां अपने लंबे अनुभव के बावजूद अगर तथ्यों के बजाय नारों की बातें करती हैं, तो हमारा अंदाज यह है कि मतदाताओं पर उसका असर अब कम होता है। ... पढ़िए0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (11 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 21 मई 2013,
सुनील कुमार
स्पाइज़ ऑफ़ द सोल
0 टिप्पणी, कविता, (12 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 21 मई 2013,
पंखुरी सिन्हा
लोकायुक्त
एक दिन वे सब जमा होकर अजगर के पास आये और अपनी व्यथा सुनायी कि आपके कारण हमारा जीना मुहाल है। अजगर ने पूरी बात सुनी। विचार करने का पोज लिया और लंबी गर्भवती चुप्पी के बाद बोला - हो सकता है, मुझसे कभी गलती हो जाती है। जब भी मेरे विरुद्ध कोई शिकायत हो, आप गुफा में आ जाइए। मैं चौबीसों घंटे उपलब्ध हूं। ... पढ़िए0 टिप्पणी, व्यंग्य, (7 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 21 मई 2013,
शरद जोशी
शब्द और सत्य
0 टिप्पणी, कविता, (7 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 20 मई 2013,
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
एक बेटी की विदा का शिलालेख!
क्यों कि तब1862 में ज़फ़र की आज़ादी की लगाई आग देश में बुझी नहीं और ब्रिटिश बहादुरों को तमाम जतन के बाद भी देश छोड़ कर जाना पड़ा था। तो क्या यह सरकार बहादुर शाह ज़फ़र की शहादत को, उस इतिहास को दुहराने की राह पर है? और उसी धुन में मगन निरंतर अपने दूध को काला बताने और जीत लेने की फ़िक्र में है? ... पढ़िए0 टिप्पणी, रोज़-रोज़, (12 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 19 मई 2013,
दयानंद पांडेय
आधे मौके महिलाओं के लिए मप्र से उठी एक अच्छी मिसाल
सरकारी तामझाम के साथ मुख्यमंत्री या मंत्रियों की मौजूदगी में एक साथ वे शादियां निपट गईं, तो समाज के गरीबों का पैसा बचा, या कर्ज लेने की नौबत बची। इसी तरह मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों जगह लड़कियों और महिलाओं के लिए कई तरह की योजनाएं ऐसी शुरू हुई हैं, जो कि देश के दूसरे बहुत से राज्यों में नहीं हैं। छत्तीसगढ़ में महिलाओं को सरकारी नौकरियों में जगह देने के लिए उनकी उम्र सीमा में इतनी बड़ी छूट दी गई है, कि महिलाएं अपने बच्चों को बड़ा करने के बाद भी नौकरी में आने की कोशिश कर सकती हैं। ... पढ़िए0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (18 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 19 मई 2013,
सुनील कुमार
प्राण शर्मा की ग़ज़ल
0 टिप्पणी, छंद > ग़ज़ल, (23 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 19 मई 2013,
प्राण शर्मा
काव्येतिहास में महेन्द्रभटनागर का रचना-जगत
दूसरे शब्दों में कहें तो वे नवजागरण की कर्मभूमि से रचनात्मक शक्ति का अवगाहन करते दिखाई देते हैं। निराला का रचनात्मक नवजागरण परवर्ती कवियों का मार्गदर्शन करता दृष्टिगत होता है, अतः डॉ. महेंद्रभटनागर का निराला-नवजागरण से प्रभावित होना स्वभाविक ही है। हिन्दी काव्य-साहित्य में यह एक नया मोड़ था। ... पढ़िए0 टिप्पणी, मूल्याँकन, (100 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 18 मई 2013,
वीरेन्द्र आस्तिक
भटकाव का शिकार माओवाद
लड़ाई की आंच अब बड़े नेताओं तक भी पहुंच रही है। इस घटनाक्रम की व्याख्या कई तरह से की जा सकती है। एक व्याख्या यह हो सकती है कि शस्त्र, इच्छाशक्ति आदि के मामले में सुरक्षा बल या माओवादियों के प्रतिस्पर्धी उन पर भारी पड़ रहे हैं। लेकिन माओवादियों के पास भी कोई कम बड़ा शस्त्र भंडार नहीं है। उनके लड़ाके भी कोई कम कुशल नहीं हैं। साथ ही वे एक खास विचारधारा से प्रभावित हैं, जो उनके लिए सुविधाप्रद बात है। ... पढ़िए0 टिप्पणी, आलेख, (43 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 18 मई 2013,
विश्वजीत सेन
असगर अली इंजीनियर नहीं रहे
मुंबई। बड़े इस्लामिक विद्वान के रुप में पहचाने जाने वाले असगर अली इंजीनियर अब नहीं रहे। लंबी बीमारी से जूझते हुए मंगलवार को उनकी मौत हो गई। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार 73 साल के इंजीनियर ने मंगलवार सुबह सांताक्रूज स्थित अपने घर में अंतिम सांस ली। ... पढ़िए0 टिप्पणी, हलचल, (25 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 17 मई 2013,
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पाकिस्तानी चुनाव अभियान: आतंकवादी अपने उद्देश्यों में स्पष्ट हैं, लेकिन क्या हम भी हैं?
दूसरी ओर पाकिस्तान एक राज्य के रूप में और हम पाकिस्तानी क़ौम के रूप में एक गहरे दलदल में खुद को महसूस करते हैं और इस परिदृश्य में विभिन्न समस्याओं और असमंजसों का सामना कर रहे हैं। हमारे पास इस खतरे से निपटने के लिए एक स्पष्ट रणनीति नहीं है क्योंकि हमारे बीच इस बात पर सहमति भी नहीं है कि ये एक खतरा है। ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (14 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 17 मई 2013,
बैरिस्टर मोहम्मद अली सैफ
झारखण्ड में संताली फिल्मोद्योग को बढ़ावा देने की जरुरत-बाबू लाल मराण्डी
0 टिप्पणी, हलचल, (19 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 16 मई 2013,
दुमका से अमरेन्द्र सुमन
या तो कांग्रेस का आक्रामक घमंड बदलेगा, या फिर अगले चुनाव में...
इस बात पर भी किसको भरोसा होगा कि सोनिया गांधी एक मनाही सुनकर भी मनमोहन सिंह जैसे आधारहीन नेता को बर्दाश्त करने पर बेबस होंगी। इसलिए अभी भी हमारा यही मानना है कि यूपीए और कांग्रेस के भीतर आज जो कुछ हो रहा है वह या तो सोनिया की मर्जी है, या फिर वे उसके लिए सहमत हैं। इससे कम इस पार्टी और गठबंधन में और कुछ नहीं हो सकता। आज हालत यह है कि यूपीए के दो केबिनेट मंत्रियों पर बड़ी-बड़ी तोहमत अदालत में लग रही है और सीबीआई के मामले में नाम जुड़ रहा है, इसके बावजूद मंत्रिमंडल की कोई बैठक नहीं हुई, यूपीए गठबंधन की कोई बैठक नहीं हुई ... पढ़िए0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (23 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 16 मई 2013,
सुनील कुमार
रीतिकालीन कविता का राजनीतिक पक्ष
जंगल में स्वतंत्र रहता है। इससे ज्यादा चिन्ता मैथिलीशरण गुप्त के पास भी नहीं थी। स्वाधीनता के महत्व का गान कर रहे थे दीनदयाल गिरि। ऐसी कविता और ऐसे काल को रामचंद्र शुक्ल के कह देने से गरियाने का काम पिछले सौ साल से हो रहा है। ये कवि तो अपनी अंग्रेजी राज की पहचान कर रहे हैं, ... पढ़िए0 टिप्पणी, मूल्याँकन, (35 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 15 मई 2013,
मैनेजर पाण्डेय
कांग्रेस की झुलसी चमड़ी के लिए मरहम, और भाजपा के लिए सबक
चुनावी आंकड़े हकीकत से अलग भी रहते हैं, और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा के कपूत येदियुरप्पा ने यह जीत अपनी पिछली पार्टी से छीनकर, तश्तरी पर धरकर कांग्रेस को तोहफे में दी है। इसलिए इसे लेकर कांग्रेस को कोई खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए। और यह भी तय है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को कर्नाटक की आज की जीत से कोई बड़ा फायदा भी नहीं मिलने वाला है, बल्कि कर्नाटक के भाजपाई भ्रष्टाचार जैसा कोई मुद्दा बाकी देश में यूपीए-विरोधी राज्यों में नहीं रहने वाला है ... पढ़िए0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (23 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 14 मई 2013,
सुनील कुमार
छाया भी साथ छोड़ देती है
0 टिप्पणी, कविता, (37 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 14 मई 2013,
राजेन्द्र उपाध्याय
छत्तीसगढी़ फिल्मों के लिए सिनेमाघर सबसे बड़ी जरूरत
रायपुर। छत्तीसगढ़ी फि ल्मों के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता सिनेमाघरों की है। अभी करीब 36 सेंटर है इस·की संख्या 150-200 हो जाए तो छत्तीसगढ़ी सिनेमा का उत्थान हो जायेगा। उक्त विचार सिनेमा के सौ साल और छत्तीसगढ़ी फिल्म विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने व्यक्त किए। ... पढ़िए0 टिप्पणी, हलचल, (42 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 13 मई 2013,
रायपुर से तापेश जैन
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