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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-4, अंक-38, जुलाई, 2009

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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इस अंक में पढ़िये

 

कविता

  स्मरणीय - मुक्तिबोध, चंद्रकात देवताले

कवि -   नवल किशोर कुमार, अरुणा राय,

                 स्वर्ण ज्योति, गिरीश पंकज,

                 अष्टभुजा शुक्ल,  नंदकिशोर आचार्य

माह का कवि - नीरज दईया

प्रवासी कविता - सुदर्शन प्रियदर्शनी

 

भाषांतर

उड़िया कहानी - दुःख अपरिमित/डॉ. सरोजिनी साहू

मेरे लिए उन दोनों के बीच में अकसर झगड़ा शुरू हो जाता था । इस कारण से मुझे अपने आप पर ख़ूब गुस्सा आता था । माँ और पापा के झगडे में हार हमेशा माँ की होती थी । पापा अपनी बड़ी-बड़ी आँखें दिखा कर चिल्लाते थे । माँ रोती थी । तब मुझे माँ को अपने गले लगाने का मन होता था । पता नहीं क्यों, स्कूली किताबों की बातें याद नहीं रख पाती थी, लेकिन मुझे ऐसे बहुत सारी बातें याद रहती थी । बचपन में 'एम' नहीं लिख पाती थी, तब मेरी माँ ने मुझे उठाकर ज़मीन पर पटक दी थी । कुछ देर तक  आँखों के सामने सब कुछ अँधेरा ही अँधेरा दिखाई देने लगा था...

 

कहानी

समकालीन कहानी - डर - सूरज प्रकाश

शारदा रसोई में चाय के बर्तन धोने गयी तो वे चुपके से जाकर एक बार फिर बच्चे को देख आयीं ''शक की कोई गुंजाइश नहीं है। उसकी नीली आँखें और गोरा रंग सारा किस्सा बयान कर रहे हैं।'' वे एक पल उसे देखती रह गयीं। हाथ आगे भी बढ़े उसे गोद में उठाने के लिए - आख़िर अपना खून है - लेकिन सकपका कर पीछे खींच लिये। तेज़ी से अपने कमरे में लौट आयीं। उन्हें हल्क़ी-सी झलक मिली - शारदा संदीप के कमरे में उसकी फ़ोटो के आगे खड़ी है। तो क्या...शारदा कहीं इस बच्चे को लेकर इस घर में घुसने का ख़्वाब तो नहीं देख रही?

प्रवासी कहानी - एक पाती - प्रतिष्ठा शर्मा

बच्चे बड़े हो गए, राहूल अमेरिका चला गया । गुड़िया की शादी हो गई । एक बार फिर शादी के नए दिनों जैसे हम दोनों अकेले घर में रह गये । पर इस बार इस बूढ़े में जीने का उत्साह ख़तम हो चुका था । तुम जानती थीं ये बात । बहुत जतन किये तुमने, मुझ में फिर से ज़िंदादिली लाने के लिए । पर मैं थक गया था, पता नहीं तुममें इतनी ऊर्जा कहाँ से थी ! तुमने आज भी पूरा घर उस ही हुनर से संभाल रखा था । दोनों बच्चे कहने को तुम से दूर थे पर उनके पल-पल की ख़बर होती थी तुम्हें । और मेरे..... तन से मन तक की हर बात तुम भाँप जाती थी...

 

 

लघुकथा

नई कास्ट्यूम - सुनील गज्जाणी

चुनाव - सुनील गज्जाणी

करवा चौंथ - मुकेश पोपली

 

ललित निबंध

भोग और शक्ति - डॉ. शोभाकांत झा

वस्तुतः भक्तिहीनता श्रद्धा-विश्वास का चुक जाना है। ईश्वर मर गया यह घोषणा करने वाला आस्थाविहीन यह युग क्या जाने कि देवता मनुष्य के लिए और मनुष्य देवुता के लिए कितना जरूरी है ? भक्ति को पूजापाठ क्रियाकाण्ड का पर्याय मानने वाले मानुष क्या जाने कि धर्म और सम्प्रदाय से भक्ति करती है, सबको सबका भाग देती है, भक्ति नहीं करती जोड़ती है। वह बाँटती है तो केवल आनन्द को, प्रेम को, उछाह को, प्रसन्नता को, वह अर्पितकर बाँटकर भोगने के लिए सूत्र देती है। उसी सूत्र की व्याक्या कदाचित मार्क्सवाद है।

 

व्यंग्य

विकास का रोग - शरद तैलंग

सुबह उठते ही नहा धोकर झक्क सफ़ेद कुर्ता पाज़ामा या गेरूए वस्त्र पहनने का मन करता है। दोनों हाथों की हथेलियाँ आपस में जुड जातीं हैं तथा हरेक ऐरा गैरा नत्थू खैरा अपना माई बाप प्रतीत होने लगता है। सबको अपने दॉँत दिखाने का मन करता है तथा विकास विकास का जाप करने की इच्छा होती है। घर के बाहर की ठीक-ठाक सड़क के छोटे-छोटे गडढे भी बडे बडे प्रतीत होने लगते है । चारों ओर गन्दगी पसरी दिखाई देती है।

 

 

विचार-वीथी

समाज, स्वतंत्रता और समलैंगिकता -शिवा नंद द्विवेदी

समलैंगिक रिश्तों के भावी परिणामो की अनदेखी करते हुए इसके वर्तमान स्वरूप एवं स्थिति के आधार पर इसे क़ानूनी एवं सामाजिक स्वीकृति प्रदान कर देना शायद हमारे वर्तमान की सबसे बड़ी भूल होगी। विचारणीय तथ्य यह है कि आज अगर 21वी सदी में समलैंगिक अल्पमत में हैं तो इस सत्य को भी सिरे से नकारा नहीं जा सकता कि सामाजिक एवं न्यायिक स्वीकृति के बाद ये समाज, युवा एवं बच्चों की सामाजिक अवधारणा को प्रभावित करेंगे या एक नयी परम्परा का प्रादुर्भाव करेंगे।

 

हिन्दी विश्व

राष्ट्रभाषा : मनन-मंथन-मंतव्य - संजय भारद्वाज


हलचल

(देश विदेश की सांस्कृतिक खबरें)

मीडिया की सनसनी का समाज पर प्रभाव

 

संपादकीय

क्या इसे ही प्रगतिशीलता कहते हैं - जयप्रकाश मानस

बंदूक की नाल कनपटी पर अड़ाकर मैं भी आपको हाँकने लगूँ तो आप भी मेरी बात करने लगेंगे । जिसे आप सहानुभूति कह रहे हैं वह भ्रम है, यह सहानुभूति नहीं, मौत के भय से उपजा दबाब है, वह तैयार की गई फौज की विवशता है जहाँ अब वह दोनों तरह से खाई से घिर चुका है । दबाबपूर्वक नक्सली बनने या नक्सलियों को मदद पहुँचाने के कारण वह समाज में संदेहास्पद हो चुका है और व्यवस्था की नज़रों में भी । यदि आप उन्हें मूलतः माओवादी मानते हैं और उन्हें माओवादियों-नक्सवादियों का अनुयायी भी कहते हैं तो भूल है।

मैं आपसे ही प्रश्न करना चाहूँगा - आप क्यों माओवादी नहीं बने, हथियार नहीं थामा, कलम को अपनाया ? शायद इसलिए कि आपको यह रास्ता उचित नहीं प्रतीत होता । शायद इसलिए भी कि आपको अभी जनतंत्र पर भरोसा है । शायद आप यह भी जानते हैं कि माओवाद जो हिंसा के रास्ते जन-समस्याओं का हल ढूँढता है मूलतः और अंततः अमानवीय और अतिवादी धारणा है जहाँ समतामूलक समाज और स्वतंत्रता आधारित समाज व्यवस्था की कोई संभावना नहीं । आपके पास किसी माओवादी देश में भारतीय प्रजातंत्र जैसी किसी व्यवस्था की सूचना या अनुभव है तो मुझे ज़रूर बतायें जो नागरिकों की भारत जैसी स्वतंत्रता की गारंटी देता है । शायद आप आप इतने शिक्षित तो हैं ही कि माओवादी हिंसा और हिंसा के बल पर नये तंत्र की स्थापना में किसी कलुषता की गारंटी नहीं ले सकते । जिसका बुनियाद ही हिंसा हो, उससे मानवता, समानता, उदारता और स्वतंत्रता की अपेक्षा नहीं की जा सकती है ।

मित्रवर, आप यह भी देख लें कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप उन आदिवासियों को माओवादियों के चंगुल से मुक्त ही नहीं करना चाहते जो फ़िलहाल भूलवश और प्राणभय से उनके साथ थे और अब उनकी असलियत जानकर उनसे मुक्ति चाह रहे हैं । यदि आप माओवादियों के प्रति आदिवासियों की सहानुभूति की निरंतर अपेक्षा की वकालत करते हैं तो कदाचित् आप इन आदिवासियों को प्रायश्चित करने का मौक़ा भी नहीं देना चाहते हैं। आपको शायद यह भी नहीं पता है कि बस्तर के सैकड़ों आदिवासी स्वस्फूर्त होकर और नक्सलियों का साथ ताउम्र के लिए छोड़कर उनके हिंसा से बस्तर को मुक्त बनाने के लिए हथियार डाल चुके हैं और एक स्वस्थ जीवन जी रहे हैं । और सिर्फ़ इतना ही नहीं वे हिंसा के ख़िलाफ़ जूझने और नागरिक जीवन को व्यवस्थित बनाने में व्यवस्था, प्रशासन और पुलिस को मदद कर रहे हैं । इन्हें आप क्या कहेंगे - भगोडे माओवादी या भारतीय प्रजातांत्रिक नागरिक?

आपने लिखा है कि जिनका सब-कुछ छीन लिया गया हो, कई बार हथियार उठाना उनके लिए अपने वजूद की रक्षा का आख़िरी उपाय होता है। दूसरे, जिनकी जीवन-स्थितियों में बदलाव और बेहतरी के सारे राजनीतिक रास्ते इस व्यवस्था में सदियों से बंद रहे आते हों और जिनके खुलने की कोई उम्मीद उन्हें आज भी----आज़ादी मिलने के साठ बरस बाद भी---नज़र न आती हो, वे आखिर क्या करें, कहाँ जायें, कैसे जियें, इस निज़ाम के नियंताओं से अपने अधिकार और अपने लिए न्याय कैसे माँगें ? इसका साफ़-साफ़ मतलब है कि आप हिंसा, हथियार, हत्या की अनुमति भी प्रजातंत्र में देने के पक्षधर हैं । फिर यदि सलवा-जुडूम के लोग नक्सली हिंसा के ख़िलाफ़ हथियार उठा लें तो उसे कैसे ग़लत कह रहे हैं ?

क्या आपने कभी हथियार उठाया है, क्या कभी आप हथियार जुटाने की जद्दोजहद की है, क्या आपने किसी निहत्थे को मारा है या कभी किसी निहत्थे को मारने की कोशिश करेंगे ? नहीं ना ! मैं जानता हूँ शायद आप ऐसा नहीं करेंगे ।

चतुर्वेदीजी, ये हिंसक माओवादी-नक्सलवादी निज़ाम के नियंताओं से अपने अधिकार और अपने लिए न्याय माँग रहे होते और उनसे नहीं मिल रहा होता तो कहीं ना कहीं आपके शब्दों में निज़ाम चलानेवाले अर्थात् मंत्री, सांसद, विधायक, जिला पंचायत सदस्य मारे जा रहे होते । दरअसल माओवादी ग़रीब और आदिवासियों के अधिकार और न्याय के लिए लड़ते होते तो इस तरह निहत्थे आदिवासियों को जबरन माओवादी वेशभूषा पहनाकर गुरिल्ला ट्रेनिंग नहीं दे रहे होते, उन्हें संघम सदस्य बनाकर मुठभेड़ में उन्हें आगे रखकर इस तरह मरवा नहीं रहे होते । आपको क्या पता कि लूटने, माल असबाब लूटने, पुलिस और अर्धसैनिक बल से लड़ने के वक्त बंदूक की नोक पर ऐसे सीधे-सरल और शांतिप्रिय आदिवासी युवक और गाँववालों को आगे रखा जाता है और वह भी सिर्फ़ लाठी, टँगिया और भाला आदि पकड़वाकर ताकि यदि मारे जायें तो सिर्फ़ ये ही मारे जायें और नक्सली कमांडर सदैव बचे रहें ।

आपको यह तो पता है ही जिस लालगढ़ की आप बात कर रहे हैं वहाँ भी नागरिकों की आड़ में माओवादी हिंसा पर उतर आये थे और समानांतर व्यवस्था के लिए नापाक और नाकामयाब हरक़त कर रहे थे । शायद आपको यह भी नहीं पता कि वे ऐसे आदिवासी नागरिकों को सिर्फ़ इसलिए अपने गुरिल्ला युद्ध में आगे करके रखते हैं ताकि ये पुलिस की ग़ल्ती से मारे जायें तो वे बड़े आराम से बोटी फेंककर पाले गये अपने कुत्तों से भौकवा सकें कि ये लो, पुलिस मानवाधिकार का हनन कर रही है ।

तो मित्रवर, आप यह भी जानने की कोशिश करें कि वे ऐसा करके उस बल को ही हतोत्साहित करते होते हैं जो सुदूर और दुर्गम जंगलों में भी घुसकर हिंसक माओवादियों और नक्सलवादियों से आदिवासियों को बचा रहे होते हैं । और यदि आप माओ को ठीक से पढ़े हैं तो यह उनकी रणनीति का ही हिस्सा है कि विरोधियों के ख़िलाफ़ हर समय दुष्प्रचार होता रहे ताकि सामान्य जन के मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ता रहे ।

क्या आपके मन में यह प्रश्न नहीं उठता कि ये माओवादी क्योंकर चुनाव में भाग नहीं लेते ? उल्टा चुनाव का बहिष्कार करते हैं । चुनाव में व्होट देनेवाले आदिवासी मतदाता के ख़िलाफ़ फ़रमान जारी करते हैं कि ख़बरदार जो किसी ने मतदान किया तो, गला रेंत दी जायेगी और मुंडी पेड़ में टाँग दी जायेगी । इसे आप क्या तानाशाही नहीं कहेंगे ? इसे आप क्या नादिरशाही नहीं कहेंगे ?

 

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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