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संपादकीय
क्या इसे
ही प्रगतिशीलता कहते हैं -
जयप्रकाश मानस
बंदूक की नाल कनपटी पर अड़ाकर
मैं भी आपको हाँकने लगूँ तो आप भी मेरी बात करने लगेंगे । जिसे
आप सहानुभूति कह रहे हैं वह भ्रम है,
यह सहानुभूति नहीं, मौत के भय से उपजा
दबाब है,
वह तैयार की गई फौज की विवशता है जहाँ
अब वह दोनों तरह से खाई से घिर चुका है । दबाबपूर्वक नक्सली
बनने या नक्सलियों को मदद पहुँचाने के कारण वह समाज में
संदेहास्पद हो चुका है और व्यवस्था की नज़रों में भी । यदि आप
उन्हें मूलतः माओवादी मानते हैं और उन्हें
माओवादियों-नक्सवादियों का अनुयायी भी कहते हैं तो भूल है।
मैं आपसे ही प्रश्न करना चाहूँगा - आप
क्यों माओवादी नहीं बने,
हथियार नहीं थामा,
कलम को अपनाया
?
शायद इसलिए कि आपको यह रास्ता उचित नहीं
प्रतीत होता । शायद इसलिए भी कि आपको अभी जनतंत्र पर भरोसा है
। शायद आप यह भी जानते हैं कि माओवाद जो हिंसा के रास्ते
जन-समस्याओं का हल ढूँढता है मूलतः और अंततः अमानवीय और
अतिवादी धारणा है जहाँ समतामूलक समाज और स्वतंत्रता आधारित
समाज व्यवस्था की कोई संभावना नहीं । आपके पास किसी माओवादी
देश में भारतीय प्रजातंत्र जैसी किसी व्यवस्था की सूचना या
अनुभव है तो मुझे ज़रूर बतायें जो नागरिकों की भारत जैसी
स्वतंत्रता की गारंटी देता है । शायद आप आप इतने शिक्षित तो
हैं ही कि माओवादी हिंसा और हिंसा के बल पर नये तंत्र की
स्थापना में किसी कलुषता की गारंटी नहीं ले सकते । जिसका
बुनियाद ही हिंसा हो,
उससे मानवता,
समानता,
उदारता और स्वतंत्रता की अपेक्षा नहीं
की जा सकती है ।
मित्रवर,
आप यह भी देख लें कि कहीं ऐसा तो नहीं
है कि आप उन आदिवासियों को माओवादियों के चंगुल से मुक्त ही
नहीं करना चाहते जो फ़िलहाल भूलवश और प्राणभय से उनके साथ थे और
अब उनकी असलियत जानकर उनसे मुक्ति चाह रहे हैं । यदि आप
माओवादियों के प्रति आदिवासियों की सहानुभूति की निरंतर
अपेक्षा की वकालत करते हैं तो कदाचित् आप इन आदिवासियों को
प्रायश्चित करने का मौक़ा भी नहीं देना चाहते हैं। आपको शायद
यह भी नहीं पता है कि बस्तर के सैकड़ों आदिवासी स्वस्फूर्त
होकर और नक्सलियों का साथ ताउम्र के लिए छोड़कर उनके हिंसा से
बस्तर को मुक्त बनाने के लिए हथियार डाल चुके हैं और एक स्वस्थ
जीवन जी रहे हैं । और सिर्फ़ इतना ही नहीं वे हिंसा के ख़िलाफ़
जूझने और नागरिक जीवन को व्यवस्थित बनाने में व्यवस्था,
प्रशासन और पुलिस को मदद कर रहे हैं ।
इन्हें आप क्या कहेंगे - भगोडे माओवादी या भारतीय
प्रजातांत्रिक नागरिक?
आपने लिखा है कि जिनका
सब-कुछ छीन लिया गया हो,
कई बार हथियार उठाना उनके लिए अपने वजूद
की रक्षा का आख़िरी उपाय होता है। दूसरे,
जिनकी जीवन-स्थितियों में बदलाव और
बेहतरी के सारे राजनीतिक रास्ते इस व्यवस्था में सदियों से बंद
रहे आते हों और जिनके खुलने की कोई उम्मीद उन्हें आज
भी----आज़ादी मिलने के साठ बरस बाद भी---नज़र न आती हो,
वे आखिर क्या करें,
कहाँ जायें,
कैसे जियें,
इस निज़ाम के नियंताओं से अपने अधिकार और
अपने लिए न्याय कैसे माँगें
?
इसका साफ़-साफ़ मतलब है कि आप हिंसा,
हथियार,
हत्या की अनुमति भी प्रजातंत्र में देने
के पक्षधर हैं । फिर यदि सलवा-जुडूम के लोग नक्सली हिंसा के
ख़िलाफ़ हथियार उठा लें तो उसे कैसे ग़लत कह रहे हैं
?
क्या आपने कभी हथियार उठाया है,
क्या कभी आप हथियार जुटाने की जद्दोजहद
की है,
क्या आपने किसी निहत्थे को मारा है या
कभी किसी निहत्थे को मारने की कोशिश करेंगे
?
नहीं ना ! मैं जानता हूँ शायद आप ऐसा
नहीं करेंगे ।
चतुर्वेदीजी,
ये हिंसक माओवादी-नक्सलवादी निज़ाम के
नियंताओं से अपने अधिकार और अपने लिए न्याय माँग रहे होते और
उनसे नहीं मिल रहा होता तो कहीं ना कहीं आपके शब्दों में
निज़ाम चलानेवाले अर्थात् मंत्री,
सांसद,
विधायक,
जिला पंचायत सदस्य मारे जा रहे होते ।
दरअसल माओवादी ग़रीब और आदिवासियों के अधिकार और न्याय के लिए
लड़ते होते तो इस तरह निहत्थे आदिवासियों को जबरन माओवादी
वेशभूषा पहनाकर गुरिल्ला ट्रेनिंग नहीं दे रहे होते,
उन्हें संघम सदस्य बनाकर मुठभेड़ में
उन्हें आगे रखकर इस तरह मरवा नहीं रहे होते । आपको क्या पता कि
लूटने,
माल असबाब लूटने,
पुलिस और अर्धसैनिक बल से लड़ने के वक्त
बंदूक की नोक पर ऐसे सीधे-सरल और शांतिप्रिय आदिवासी युवक और
गाँववालों को आगे रखा जाता है और वह भी सिर्फ़ लाठी,
टँगिया और भाला आदि पकड़वाकर ताकि यदि
मारे जायें तो सिर्फ़ ये ही मारे जायें और नक्सली कमांडर सदैव
बचे रहें ।
आपको यह तो पता है ही जिस लालगढ़ की आप
बात कर रहे हैं वहाँ भी नागरिकों की आड़ में माओवादी हिंसा पर
उतर आये थे और समानांतर व्यवस्था के लिए नापाक और नाकामयाब
हरक़त कर रहे थे । शायद आपको यह भी नहीं पता कि वे ऐसे आदिवासी
नागरिकों को सिर्फ़ इसलिए अपने गुरिल्ला युद्ध में आगे करके
रखते हैं ताकि ये पुलिस की ग़ल्ती से मारे जायें तो वे बड़े
आराम से बोटी फेंककर पाले गये अपने कुत्तों से भौकवा सकें कि
ये लो,
पुलिस मानवाधिकार का हनन कर रही है ।
तो मित्रवर,
आप यह भी जानने की कोशिश करें कि वे ऐसा
करके उस बल को ही हतोत्साहित करते होते हैं जो सुदूर और दुर्गम
जंगलों में भी घुसकर हिंसक माओवादियों और नक्सलवादियों से
आदिवासियों को बचा रहे होते हैं । और यदि आप माओ को ठीक से
पढ़े हैं तो यह उनकी रणनीति का ही हिस्सा है कि विरोधियों के
ख़िलाफ़ हर समय दुष्प्रचार होता रहे ताकि सामान्य जन के मन में
व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ता रहे ।
क्या आपके मन में यह प्रश्न नहीं उठता
कि ये माओवादी क्योंकर चुनाव में भाग नहीं लेते
?
उल्टा चुनाव का बहिष्कार करते हैं ।
चुनाव में व्होट देनेवाले आदिवासी मतदाता के ख़िलाफ़ फ़रमान
जारी करते हैं कि ख़बरदार जो किसी ने मतदान किया तो,
गला रेंत दी जायेगी और मुंडी पेड़ में
टाँग दी जायेगी । इसे आप क्या तानाशाही नहीं कहेंगे
?
इसे आप क्या नादिरशाही नहीं कहेंगे
?

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