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मंजुल भटनागर की कविताएँ


सच और जनधारणा के बीच बड़ा फासला हो सकता है...

सोशल मीडिया पर हम रात-दिन यह देखते हैं कि किस तरह लोग पूरी गैरजिम्मेदारी से किसी भी झूठ को आगे बढ़ाते चलते हैं, और उन्हें यह फिक्र भी नहीं रहती कि जो लोग इस झूठ को पकड़ लेंगे, उनके बीच उनकी साख कैसे गिरेगी, कितनी गिरेगी। यह सिलसिला आज बड़ा आम हो गया है कि अपने मकसद को पूरा करने के लिए कोई झूठ इतना फैलाया जाए कि वह सच लगने लगे
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मेरी इच्छा है, अगले जन्म में भी कवि बनूं : अखिलेश्वर पांडेय

कवि होना पूर्व जन्मों का संस्कार है, ताप, संताप और आरोह-अवरोध आदि इसके मार्ग में बाधक बन ही नहीं सकते। जनसरोकारों के लिए सदा समर्पित और मानवीय मूल्यों पर केंद्रित कविता की रचना करना मेरा कर्म है। यह भाव उनकी इन पंक्तियों में साफ झलकता है - कविताएं रहेंगी तो/ सपने भी रहेंगे/ कविताएं सपनों के संग ही/ जीवन के साथ हैं / कभी-कभी पांव हैं/ कभी-कभी हाथ हैं
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कोलाहल कलह में कविता

आधुनिक काल में ही नहीं बल्कि अगर हम कविता के इतिहास पर नजर डालें तो हिंदी कविता अपने शुरुआती दौर में भी अलग अलग रूपों और शैलियों में लिखी गई । भक्तिकाल के कवियों पर अगर विचार करें तो उनकी कविताओं में एक साझा सूत्र भक्ति का अवश्य दिखाई देता है लेकिन सूर, तुलसी जायसी की रचनाओं के भाव अलग अलग हैं कोई श्रृंगार काव्य है तो कोई प्रेम का महाकाव्य तो कोई वीरकाव्य
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बहुजन साहित्य की रूपरेखा


बहुजन साहित्य की रूपरेखा

अपनी उपलब्धि पर गर्व करने का अधिकार उन्हें है। इसीलिए कबीर, फुले, पेरियार आदि जो दलित साहित्य में पहले से ही सम्मानित स्थान रखते हैं, को ‘ओबीसी’ के नाम पर झटक लेना उन्हें स्वीकार नहीं है। कमोबेश यही मानसिकता आदिवासी पृष्ठभूमि के साहित्यकारों की भी है। पुस्तक के कुछ लेखों में बहुजन साहित्य को लेकर स्वागत का भाव है, तो कुछ को पढ़कर लगता है कि दलित साहित्यकार बहुजन साहित्य की धारा में पूरी तरह समाहित होने के बजाए उसमें बड़े भाई की भूमिका को बनाए रखना चाहते हैं
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राखी और साक्षी

यह हाल महज हरियाणा का नहीं है, आज जिस तरह देश भर में राखी मनाई जा रही है, उसे देखकर हम सोच रहे हैं कि भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं की हालत क्या साल में एक दिन राखी बंधवाकर उन्हें रक्षा का वचन देने से सुधर सकती है? और आज ही मथुरा में जिंदगी का आखिरी लंबा दौर गुजारती विधवा महिलाओं की तस्वीर लेकर आया है कि वे किस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर वाली राखियां लेकर बैठी हैं
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गर्भगृह

वे लोग बिना किसी कारण के ही हैरानी में पड़ सकते हैं। अगर ऐसी कुछ बातें लीक हो जाती है, तो वह अनिकेत को, अपने बच्चों को, सगे-संबंधियों और अपने देश-वासियों को क्या जवाब देगी । उस समय कौन उस पर विश्वास करेगा कि उन दोनों में केवल प्रेम ही था। प्रेम, वह भी इस उम्र में ? छिः! इतना जलील होने से पहले तो उसके लिए मर जाना उचित रहता
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शशांक मिश्र भारती की तीन कविताएं


तपस्वी साहित्यकार थे आचार्य शिवपूजन सहाय : प्रो सिद्धेश्वर प्रसाद

पटना। हिन्दी साहित्य को अपनी देन से बड़ी ऊंचाई प्रदान करने वाले अद्भुत प्रतिभा के साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय तपस्वी साहित्यकार थे। वे बिहार के अकेले साहित्यकार थे, जिन्हें महाकवि जयशंकर प्रसाद तथा उपन्यास-सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जैसे हिन्दी के महान साहित्यकारों केसाथ अत्यंत निकट का संबंध रहा और वे सभी आचार्य जी के प्रति श्रद्धा रखते थे
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उप्र में बाप-बेटे की कुश्ती समाजवाद है या नूराकुश्ती?

उत्तरप्रदेश के इस हाफ सेंचुरी वाले कुनबे में सब कुछ बेकाबू लग रहा है। इस कुनबे के 48 से अधिक लोग केंद्र और राज्य की राजनीति में हैं, और मुलायम के समधी लालू का कुनबा देश का दूसरा सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा है, ऐसे में अगर अपना घर काबू में नहीं है, तो घर से चलता लोकतंत्र आखिर जा किधर रहा है
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अब तो दुनिया को रमजान के महीने और जुमे की नमाज़ से डर लगने लगा है

कभी ऐसे भी सोच कर देखिए न। ग़लत बात को ग़लत और सही बात को सही कहना सीखिए। धर्म के पिजड़े से बाहर निकलिए। बेहतर दुनिया के लिए। कुतर्क, सेक्यूलरिज्म और मज़हब की आड़ में वहशी और दहशतगर्द लोगों की पैरवी बंद कीजिए। इन लोगों और इन की मानसिकता को कंडम कीजिए। मनुष्यता बड़ी है, हिंदू-मुसलमान नहीं। मनुष्यता बचेगी, मनुष्य बचेगा तभी हिंदू-मुसलमान भी बचेगा। दुनिया को ज़न्नत ही रहने दीजिए, जहन्नुम न बनने दीजिए
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हरित क्रांति, श्वेत क्रांति की तरह अब गैस-क्रांति

रेलू चूल्हों से उठने वाले प्रदूषण से महिला और उसके बच्चों को सबसे बुरा और सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है। अमरीका के प्रतिष्ठित बर्कले विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कर्क स्मिथ दो-दो नोबल पुरस्कारों में भागीदार रहे हैं, और भारत में वे आधी सदी से काम करते आए हैं, उनका यह निष्कर्ष है कि परमाणु बिजलीघर की इतिहास की आज तक की सारी दुर्घटनाओं को मिला दिया जाए, तो भी एक महीने में घरेलू चूल्हे से होने वाली मौतों का आंकड़ा वे नहीं छू सकते
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पं. गिरिजा कुमार पांडेय स्मृति सम्मान 2016

रायपुर। साहित्य, संस्कृति एवं भाषा की वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम के संयोजन में ख्यात छायावादी कवि पद्मश्री डॉ. मुकुटधर पांडेय के प्रपौत्र, सुपरिचित लेखक, संस्कृतिकर्मी स्व. श्री गिरिजा कुमार पांडेय (रायगढ़, छत्तीसगढ़) की स्मृति में रचनात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने हेतु उनके परिवार की ओर से प्रारंभ ‘गिरिजा कुमार पांडेय स्मृति सम्मान-2016 हेतु भारतीय/प्रवासी भारतीय रचनाकारों से प्रविष्टियाँ आमंत्रित हैं
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सामाजिक विकास और साहित्य का संदर्भ

विकसित होने के बावजूद विषम समाज में जीने के लिए बाध्य है आज का मनुष्य। इसलिए आज का मनुष्य पहले के मनुष्य से अधिक संपन्न होने के बावजूद पहले के मनुष्य से कहीं अधिक दुखी और विपन्न है। संपन्नता उसके दुख को कम करने में किसी भी प्रकार से मददगार नहीं हो पा रही है। विपन्नता उसके जीवन का स्थाई भाव है। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस दुख में वह बिल्कुल अकेला है। कोई उसका दुख बाँटने के लिए तैयार नहीं है
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पांड़े जी

सच जैसे आरी की तरह उनकी छाती पर चल रहा था। पांडे जी का दुख और कम होता अगर वो लड़का पंडित न होता। वो पांडे और वो लड़का सुकुल। किसी भी कोने से उन्हें लगा होता कि वो लड़का ब्राह्मण है और गुदड़ी का लाल है , तो वो कभी भी उससे सड़क पर खड़े हो कर झगड़ा न करते। लेकिन अब क्या हो सकता था
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भूल -भुलैया

"यह तो तुम दोनों के बीच बहुत दिनों से होता रहा है तो फिर अब मुहं लटकने का क्या मतलब?" "अब मैंने भी तय कर लिया है कि न तो उसका फोन सुनुँगा और न ही उसे फोन करूंगा ।"
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सरलता और साफगोई की एक प्राचीर नीलाभ

वह बड़ी देर तक यह बताते रहे कि ग्लास भले थोड़ी बड़ी है , पर लाहौरी नहीं है । पैग भी बड़ा है , पर पटियाला नहीं है । वगैरह-वगैरह । फिर वह अपने बी बी सी के दिनों में डूब गए । विष्णु नागर के जर्मनी रेडियो और जाने किन-किन लोगों के दिनों में डूब गए । अपने अनुवाद कार्यों की चर्चा , अपनी कविता और धर्मयुग में नामवर सिंह द्वारा लिखी गई अपनी कविता पुस्तक की समीक्षा की चर्चा पर आ गए
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बराक ओबामा की बेटी की मिसाल से सीखे की जरूरत

यहां पर किसी रेस्त्रां में मेज पर खाना परोसना, या जूठे बर्तन उठाना, या मेज को पोंछना शर्म की बात मानी जाएगी, और ऐसा करने के बजाय अधिकतर लोग बिना जेब खर्च के रहना पसंद करेंगे। आज अमरीका अगर आगे बढ़ा हुआ देश है, तो वहां पर सभी तरह के काम के लिए अधिकतर आबादी के मन में किसी तरह की हेठी नहीं रहती है, और संपन्न तबके के जो बच्चे बिना ऐसे पार्ट टाईम काम किए हुए बड़े हो जाते हैं
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नहीं तो पुरुष सत्ता का वर्चस्व बना रहेगा!

इसका प्रमुख कारण जाति प्रथा की मौजूदगी है। जितने भी एनजीओ हैं सभी के मुख्य कार्यकर्ता या पदाधिकारी, प्रशासनिक पदाधिकारी, एडवोकेट, जज सब ज्यादातर सवर्ण जातियों से आते हैं और इन लोगों का सरकार से मिलीभगत होती है। बहुजन महिलाओं को इन सभी पदों से दूर रखने की एक साजिश होती है
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परशुराम की याज्ञसेनी प्रतिभा

पहली कविता प्रातःकाल पर थी,जिसमे सूर्य उन्हें माँ के माथे की लाल बिंदी-सा दिखा। छठी कक्षा की इस छात्रा की पहली कविता जब दैनिक `प्रजातंत्र’ में छपी, तो छात्रा और उसके हेड मास्टर पिता दोनों खुशी से उछल पड़े। प्रतिभा पाँच बहनों और दो भाइयों में सबसे विद्रोही और जिद्दी मानी जाती थीं। उनकी कविता की ओर रुझान कवि पिता के लिए आश्वस्तिदायक था, मगर वे छंदमुक्त कविता पसंद नहीं करते थे
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