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सृजनगाथा

 

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वर्ष-3, अंक-27, अगस्त, 2008

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इस अंक में पढ़िये

समकालीन कविताएँ

  स्मरणीय- नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह

  पुरस्कृत - रविकांत की 10 कविताएँ

समकालीन कवि - देवांशु पाल, अनिल मिश्र, असद ज़ैदी,

आशुतोष दुबे,  विश्वरंजन

प्रवासी कवि - धवन भगत-डेनमार्क, हरिहर झा-आस्ट्रेलिया

माह का कवि - फ़ज़ल इमाम मल्लिक

 

छंद

ग़ज़ल -  बेकल' उत्साही, ज़िया ज़मीर, विनीता गुप्ता,

डॉ. महेन्द्र अग्रवाल, अमर ज्योति

गीत -देवमणि पांडेय, डॉ. दीप्ति गुप्ता, डॉ. दिवाकर वर्मा, हृदयेश्वर

माह के छंदकार - शरद सिंह

दोहा डॉ. रामनिवास मानव

अजय गाथा -  इंदप्रस्थ बदनाम है

 

भाषांतर

 आख़िर मैं तेरा शौहर हूँ निर्मला - परशु प्रधान

नेपाली कहानी - फिर तो दूसरे दिन से ही निर्मला इस महानगर में उसी भाई के साथ नौकरी के लिए दर--दर भटकी थी। शहर की हर गली को उसने नापा था। अपने-पहचाने, अनजाने, नाम सुने-अनसुने लोगों को अपनी दुःख भरी कहानी कह सुनाई थी- " शौहर को गए हुए महना भर होने को है। कुछ अता-पता नहीं है। दो बच्चे हैं। सात-आठ सौ तो कमरे का किराया ही है ऊपर से बिजली-पानी जोड़ने पर तो हजार तो गए ही। साथ में दो पैसे भी नहीं, कोई छोटा मोटा काम....।"...

 

रेत(पंजाबी उपन्यास/भाग-9 ) - हरजीत अटवाल/सुभाष नीरव

 

मूल्याँकन

हिंदी ऐतिहासिक उपन्यासों की उपलब्धियाँ - नरेन्द्र कोहली

 

एक शब्द

 हाथ - डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया

 

प्रसंगवश

घातक है कट्टरपंथियों का अभियान - तनवीर जाफ़री

आंतरिक सुरक्षा पर अब तो सोचिए ! - संजय द्विवेदी

 

शेष-विशेष

रचना-यात्रा...

मेरी रचना-यात्रा - डॉ. भैरूलाल गर्ग

तकनीक...

मोबाइल मेनिया- जान जोख़िम में - रविशंकर श्रीवास्तव

विचार...

संयम की सामाजिक प्रांसगिकता - डॉ. महावीर शरन जैन

व्यक्तित्व....

कश्मीरियत की राह में राही को ज्ञानपीठ - कृष्ण कुमार यादव

शोध....

दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता - डॉ. सी. जय शंकर बाबु

हिंदी लघुकथा का विकास(भाग - 9) - डॉ. अंजलि शर्मा  

 

प्रवासी-पातियाँ

पिट्सबर्ग से....

अहिंसा परमो धर्मः - अनुराग शर्मा

 

ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)

लौटते हुए परिंदे(कहानी संग्रह) - सुरेश तिवारी

कारवाँ लफ़्जों का (मुक्तक एवं ग़ज़ल संग्रह) - जयंत थोरात

प्रिय कविताएँ - भगत सिंह सोनी

 

हलचल

(देश विदेश की सांस्कृतिक खबरें)

युवा कवि रविकान्त को नवलेखन का ज्ञानपीठ पुरुस्कार

मेला बालसाहित्य-वार्षिकी के लिए रचनाएँ आमत्रित

रज़ा हैदरी सम्मान से नवाजे गये थोरात

राजस्थान की साहित्यिक दुनिया में इन दिनों उद्वेलन है!

ब्रिटिश संसद में एक बार फिर गूँजी हिन्दी

30 वाँ अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन दुबई में

 

 

संपादकीय

हिंदी भाषा एवं साहित्य की वैश्विक दशा

इंटरनेट में मिलने वाली 98 प्रतिशत जानकारी दुनिया की जिन गिनी-चुनी 12 भाषाओं में है, उसमें हिंदी भी है । वैज्ञानिक और साहित्यिक बुद्धिजीवियों के प्रयासों से हमारी हिंदी विदेशी भाषाओं के समानांतर आगे बढ़ रही है । इंटरनेट द्वारा वैश्विक प्रतिष्ठा के हनुमान को अब अँगरेज़ी की सुरसा नामक राक्षसी नहीं भरमा सकती । वहाँ अब हिंदी और साहित्य लेखन – पठन - पाठन और उसकी बहुआयामी आवाज़ाही की लगभग सारी अपरिहार्य तकनीकी-कलायें मौजूद हैं । ऐसे में उस सूचना प्रौद्योगिकी के प्रति, जिसका हिंदी से भी रिश्ता कायम हो रहा है, विश्वास जताया जा सकता है कि – कौन सो संकट मोर ग़रीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारो ।...

 

कहानी

एक और मानवी - अलका प्रमोद

उसे आज भी याद है - जब वह नन्हीं-सी थी, करीब इतनी ही बड़ी जितनी इस समय उत्कर्ष की बेटी होगी । जब वह आँख खोलती तो मम्मी और पापा जा चुके होते ओर उसे काली कलूटी मोटी मालती झिंझोड़ कर उठाते हुए कहती, ''बेबी उठो स्कूल का समय हो गया है'', यदि वह ना-नुकुर करती तो पकड़ कर खड़ा कर देती। मानवी को उसका चेहरा देख कर ही गुस्सा आ जाता था । उसका मन होता कि मम्मी उसे प्यार से उठाएँ जैसे छुट्टी के दिन कभी-कभी वह उठातीं थीं, उस दिन तो वह एक बार में ही उठ जाती थी पर मम्मी के पास तो समय ही नहीं रहता था। स्कूल से लौटती तो भी मालती ही मिलती । ......

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पाषाण जिंदगी - स्वर्ण ज्योति

नौकरी - सुरेश तिवारी

 

धारावाहिक उपन्यास

पाँव ज़मीन पर - शैलेन्द्र चौहान - भाग 4

हमारे घर के एक ओर डोकरी अइया का घर था तो दूसरी ओर एक पतली गली के बाद पलटू दाऊ रहते थे उनकी पूरी तरह रुई की तरह सफेद हुई दाढ़ी मुझे बहुत अच्छी लगती थी दाढ़ी थी भी खूब लंबी, एकदम दिव्य पुरुष लगते थे वे, गाँव वाले उन्हें साधू कहते उनके साथ उनकी एक मात्र संतान बिट्टी रहती थी और बिट्टी का लड़का किशन किशन मुझसे पाँच : वर्ष बड़ा था हमारे गाँव में स्कूल नहीं था सो किशन कोई दो तीन मील दूर घिटौली पढ़ने जाता वह कभी-कभी ही हमारे साथ खेलता एक दिन उनके घर के सामने खड़ा बड़ा सा नीम का पेड़ गिर गया, अब तो हमारे मजे ही गए

 

 

लघुकथा

कृष्ण की कूटनीति - हरीश नवल

अंतर - नरेन्द्र कोहली

झलमला - स्व. पदुमलाल पन्नालाल बख्शी

 

व्यंग्य

गुस्से में है भैंस - शरद तैंलंग

मीडिया पर मंहत - वीरेन्द्र जैन

 

ललित निबंध

महिष को निहारते हुए - जयप्रकाश मानस

 

संस्मरण

मुक्तिबोध की याद - महेन्द्र भटनागर

कुछ वर्ष बाद, मुक्तिबोध जी से उज्जैन में ही पुनः भेंट हुई डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन जी के निवास पर। उन दिनों मैं धार में था (29-7-50 से 27-9-55) और कुछ दिनों के लिए उज्जैन आया हुआ था। तब नये कवियों पर एक समीक्षा-पुस्तक तैयार करने का विचार उन्होंने प्रकट किया था। एक कविता-संकलन के तैयार करने की बात भी उन्होंने मुझे लक्ष्य करते हुए कही -भारतेन्दु से भटनागर तक

 

पुस्तकायन

Things I have Learned...-Stefan, Daniel, Steven, Nancy

विकल्प की तलाश - डॉ. रामगोपाल सिंह

रहिमन पानी राखिए - डॉ. विद्यानिवास मिश्र

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा