SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-36, मई, 2009

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

इस अंक में पढ़िये

कविता

  स्मरणीय - सुमित्रानंदन पंत, हरिनारायण व्यास

कवि - सुदीप बनर्जी, जयप्रकाश मानस, केशव तिवारी,

               अरुण शीतांश, रवीन्द्र कुमार खरे

माह का कवि - डॉ. श्यामसुंदर दुबे

प्रवासी कविता - प्रो. हरिशंकर आदेश, ट्रिनिडाड

 

छंद

गीत- अंबिकाप्रसाद दिव्य, तारादत्त निर्विरोध,डॉ. महेन्द्र कुमार

ग़ज़ल -अनवर सलीम, सरदार सलीम, राजेश रेड्डी

हायकू - ओमप्रकाश यती  

माह का छंदकार  (ग़ज़ल) - विज्ञान व्रत

 

भाषांतर

गंगाधर मेहेर की दो कविताएँ

स्तेफ़ान स्पेंडर की अँगरेज़ी कविता

 

संस्कार

साहित्य और कविता - माखनलाल चतुर्वेदी

कला, सच और राजनीति - हैरॉल्ड पिंटर

 

 

मूल्याँकन

वर्जनाओं के विरूद्ध कविता के नये प्रतिमान-सुशील कुमार

 

अनुवाद की संस्कृति - मनोज सिंह

 

विचार-वीथी

ख़ुद के लिए जी रहा है आदमी - नन्दलाल भारती

 

बचपन

आप अच्छी हैं पर सबसे अच्छी नहीं - रचना श्रीवास्तव

 

प्रसंग-वश

चुनाव परिणामों का संदेश - तनवीर जाफ़री

 

लोक-आलोक

लोकगीतों का केरल

मलयालम काव्य क्षेत्र में क्रान्ति मचाने वाली काव्य कृति तुञ्चत्तेष़ुत्तच्छन का 'किळिप्पाट्टुकल' नाम से जानी जाती थी, जिसका रचनाकाल 16 वीं शताब्दी माना जाता है । एष़ुत्तच्छन की भाषा में साहित्यिक भाषा का सहज स्वाभाविक परिणति है। मलयालम भाषा का सर्वाधिक परिनिष्ठित रूप एष़ुत्तच्चन के काल में दिखाई देता है। इतना श्रेष्ठ रूप न तो कवित्रय काल में दिखाई दिया और न ही उनके परवर्ती युग में ।

 

 

शेष-विशेष

डायरी....

योरप की डायरी - यात्रा दुश्वार - प्रमोद वर्मा

इनदिनों....

किताबों की क़ीमत कम कीजिये हुज़ूर - अख्तर अली

विश्वहिन्दी....

विदेशों में हिन्दी शिक्षण - प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन

नगरनामा....

अब गेंदा फूल भर नहीं हैं रायपुर - संजय द्विवेदी

मीडिया

मीडिया की हिन्दी हिन्दी की मीडिया - संजय द्विवेदी

 

प्रवासी पातियाँ

अमेरिका से

मानव स्वभाव एक-सा ही है - डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

 

हलचल

(देश विदेश की सांस्कृतिक खबरें)

साहित्य सम्मलेन प्रयाग : शताब्दी वर्ष समारोह संपन्न

मीडियाकर्मी को तीसरा सृजनगाथा सम्मान

साहित्य का कौमी एकता अवार्ड अभिज्ञात को

मोरवाल और मोहन राणा पुरस्कृत

फ्रांस में बेबी हालदार

प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान हेतु प्रविष्टि आमंत्रित

कृष्ण कुमार यादव के संग्रह अभिलाषा पर समीक्षा गोष्ठी

चिट्ठा-लेखन व अंतरजाल पत्रकारिता पर कार्यशाला संपन्न

 

1

संपादकीय

कुछ कहना लाज़िमी है - जयप्रकाश मानस

हिन्दी के नये पाठकों की सबसे बड़ी लाचारगी है कि उसकी पाठकीयता में पुरातन का रोमांस नहीं है । वह अपने इतिहास पुरुषों से विमुख रहता है । अतीत की चमक को आधुनिकता के संभ्रम में लगातार नज़रअंदाज़ करते चला जाता है। आज हिन्दी की बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में पुरानी पीढ़ी को बिसारने की जैसे होड़ लगी हो । यह नहीं भूलें कि समकालीनता अतीत से ही रस लेती है।

 

कहानी

क्रेज़ी फ़ैंटेसी की दुनिया - अभिज्ञात

प्रोफ़ेसर पश्चाताप की आग में जलने लगे। अब वे अनुसंधान केन्द्र बेहद कम जाते। बच्ची के साथ अधिक से अधिक वक़्त गुज़ारते। बच्ची को कहानियाँ सुनने का बड़ा शौक था। और उसकी ज़िद पर वह रोज़ रात को कहानियाँ सुनाते। बचपन में सुनी और बाद में पढ़ी कहानियाँ को उनका स्टाक ज़ल्दी ही ख़त्म हो गया किन्तु बेटी की फ़रमाइशें जारी रहीं। अब वे मनगढ़ंत किस्से सुनाने लगे थे और ज़ल्द ही इसमें माहिर हो गये।

छँटा कोहरा - किरण राजपुरोहित

 

ललित निबंध

एक पेड़ चाँदनी - विश्वनाथ प्रसाद

चाँदनी का पेड़ लोग बहुत दिनों से लगा रहे हैं । हज़ारों साल से आदमी जुझ रहा है, चाँदनी का पेड़ उगाने के लिए। ऐसा नहीं कि किसी एक जगह चाँदनी की खेती की गयी । कुछ ऐसी भी ज़मीनें थीं जो सारे बीज को निगल गईं । जो पानी डाला गया, उसे भी पी गईं । फिर भी आदमी हारा नहीं । सही बात तो यह है कि चाँदनी अमूर्त है ।

 

लघुकथा

सेवा - संजय कुमा

चार लघुकथाएं - भगीरथ

घर फूँक तमाशा देख - ललिता भाटिया

संतोष - ओमीना राजपुरोहित 'सुषमा'

मृगतृष्णा - साधना सोलंकी

 

संस्मरण

ख़तो किताबत पर बड़ा भरोसा था नईम को - विनोद साव

ख़तो-किताबत पर कितना भरोसा था नईम साहब को ! ख़तो-किताबत इन शब्दों को जानते हुए भी इन्हें पहली बार नईम साहब से ही सुना। उनके एक ही पत्र से यह जाहिर होता है कि वे ख़तो-किताबत यानी पत्र-व्यवहार के प्रति कितने संजीदा इन्सान थे। अमूमन आज फ़ोन और मोबाइल के इस समय में यह चलन बहुत कम हो गया है ।

 

कथोपकथन

बरगद जेठ और मोर है देवर..- सुलोचना रांगेय

(सुलोचना रांगेय राघव से साधना सोलंकी की बातचीत)

मैंने हमेशा रांगेय राघव की ही छवि ूँढनी चाही...पर वे तो एक ही थे। अपनी अस्वस्थता में भी वे बराबर चिंतन मनन करते, कभी कविताएँ लिखते, कभी चित्र बनाते। अंत तक पूरी कर्मठता और जिजीविषा के साथ रहे। मुझे बराबर पढऩे और आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहने की हिदायत देते रहे।

मुरौव्वत में घटिया सामग्री छप जाती है - रवीन्द्र कालिया

(रवीन्द्र कालिया से दिनेश श्रीनेत की बातचीत)

 

पुस्तकायन

यक्ष प्रश्न-डॉ. अजय पाठक

Marrying Anita-Anita jain

पृथ्वी पर एक जगह-शिरीष मौर्य

 

ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)

लौटते हुए परिंदे(कहानी संग्रह) - सुरेश तिवारी

इंद्रधनुष (कविता संग्रह) - डॉ. महेन्द्र भटनागर

प्रिय कविताएँ (कविता संग्रह) - भगत सिंह सोनी

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

सर्वाधिकार सुरक्षित © www.srijangatha.com (सृजन-सम्मान)

'सृजनगाथा' बहुआयामी सांस्कृतिक संगठन 'सृजन-सम्मान' की अव्यावसायिक मासिक पत्रिका है ।

'सृजनगाथा' में प्रकाशित रचनाओं में अभिव्यक्त विचारों से संपादकीय या प्रकाशकीय सहमति अनिवार्य नहीं है

Google