|
संपादकीय
हिंदी भाषा एवं साहित्य की वैश्विक दशा
इंटरनेट में मिलने वाली
98
प्रतिशत
जानकारी दुनिया की जिन गिनी-चुनी
12
भाषाओं में है, उसमें हिंदी भी है । वैज्ञानिक
और साहित्यिक बुद्धिजीवियों के प्रयासों से हमारी हिंदी विदेशी
भाषाओं के समानांतर आगे बढ़ रही है । इंटरनेट द्वारा वैश्विक
प्रतिष्ठा के हनुमान को अब अँगरेज़ी की सुरसा नामक राक्षसी
नहीं भरमा सकती । वहाँ अब हिंदी और साहित्य लेखन – पठन - पाठन
और उसकी बहुआयामी आवाज़ाही की लगभग सारी अपरिहार्य
तकनीकी-कलायें मौजूद हैं । ऐसे में उस सूचना प्रौद्योगिकी के
प्रति, जिसका हिंदी से भी रिश्ता कायम हो रहा है, विश्वास
जताया जा सकता है कि – कौन सो संकट मोर ग़रीब को, जो तुमसे
नहिं जात है टारो ।...

कहानी
◙
एक और मानवी
- अलका
प्रमोद
उसे आज भी याद है
-
जब वह
नन्हीं-सी
थी,
करीब इतनी ही बड़ी जितनी इस समय उत्कर्ष
की बेटी होगी । जब वह
आँख
खोलती तो मम्मी और पापा जा चुके होते ओर
उसे काली कलूटी मोटी मालती झिंझोड़ कर उठाते हुए कहती,
''बेबी उठो स्कूल का
समय हो गया है'',
यदि वह ना-नुकुर
करती तो पकड़ कर खड़ा कर देती। मानवी को उसका चेहरा देख कर ही
गुस्सा आ जाता था । उसका मन होता कि मम्मी उसे प्यार से
उठाएँ
जैसे
छुट्टी
के दिन कभी-कभी
वह उठातीं थीं,
उस दिन तो वह
एक बार में ही उठ जाती थी पर मम्मी के पास तो समय ही
नहीं
रहता था। स्कूल से लौटती तो भी मालती ही
मिलती ।
......
----
◙
पाषाण जिंदगी
-
स्वर्ण ज्योति
◙
नौकरी
- सुरेश तिवारी

धारावाहिक
उपन्यास
◙
पाँव ज़मीन पर
-
शैलेन्द्र चौहान
-
भाग 4
हमारे
घर
के
एक
ओर
डोकरी
अइया
का
घर
था
तो
दूसरी
ओर
एक
पतली
गली
के
बाद
पलटू
दाऊ
रहते
थे
।
उन की
पूरी
तरह
रुई
की
तरह
सफेद
हुई
दाढ़ी
मुझे
बहुत
अच्छी
लगती
थी
।
दाढ़ी
थी
भी
खूब
लंबी,
एकदम
दिव्य
पुरुष
लगते
थे
वे,
गाँव
वाले
उन्हें
साधू
कहते
।
उनके
साथ
उनकी
एक
मात्र
संतान
बिट्टी
रहती
थी
और
बिट्टी
का
लड़का
किशन
।
किशन
मुझसे
पाँच
छ:
वर्ष
बड़ा
था
।
हमारे
गाँव
में
स्कूल
नहीं
था
सो
किशन
कोई
दो
तीन
मील
दूर
घिटौली
पढ़ने
जाता
।
वह
कभी-कभी
ही
हमारे
साथ
खेलता
।
एक
दिन
उनके
घर
के
सामने
खड़ा
बड़ा
सा
नीम
का
पेड़
गिर
गया,
अब
तो
हमारे
मजे
ही
आ
गए
।

लघुकथा
◙
कृष्ण की कूटनीति -
हरीश नवल
◙
अंतर
-
नरेन्द्र कोहली
◙
झलमला
-
स्व. पदुमलाल पन्नालाल बख्शी

व्यंग्य
◙
गुस्से में है भैंस
-
शरद
तैंलंग
◙
मीडिया पर मंहत
-
वीरेन्द्र जैन

ललित निबंध
◙
महिष को निहारते हुए
-
जयप्रकाश मानस

संस्मरण
◙
मुक्तिबोध की याद
-
महेन्द्र भटनागर
कुछ वर्ष बाद,
मुक्तिबोध जी से उज्जैन
में ही पुनः भेंट हुई डॉ. शिवमंगलसिंह
‘सुमन’
जी के निवास पर। उन दिनों मैं धार में था (29-7-50
से 27-9-55)
और कुछ दिनों के लिए उज्जैन आया हुआ था। तब नये कवियों पर एक
समीक्षा-पुस्तक तैयार करने का विचार उन्होंने प्रकट किया था।
एक कविता-संकलन के तैयार करने की बात भी उन्होंने मुझे
लक्ष्य करते हुए कही
-
‘भारतेन्दु
से भटनागर तक’।

पुस्तकायन
◙
Things I have Learned...-Stefan,
Daniel, Steven, Nancy
◙
विकल्प की तलाश
-
डॉ. रामगोपाल सिंह
◙
रहिमन पानी राखिए
-
डॉ. विद्यानिवास मिश्र

|